

Why Trump's Project Dream Will be Fail in Iran: अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने हाल ही में ईरान के खिलाफ प्रोजेक्ट फ्रीडम लॉन्च करने का ऐलान किया था। उनके इस ऐलान के बाद एक बार फिर दोनों देशों के बीच तनाव अपने चरम पर आ गया है। ईरान ने इसे डेडलॉक प्रोजेक्ट करार दिया। साथ ही कहा कि, किसी भी राजनीतिक समस्या का हल सैन्य कार्रवाई से नहीं किया जा सकता है।
ईरान के साथ-साथ विशेषज्ञों ने भी ट्रंप के इस प्रोजेक्ट की सफलता को लेकर सवाल उठाए हैं। उनका मानना है कि डोनाल्ड ट्रंप इस प्रोजेक्ट को जितना आसान बताने की कोशिश कर रहे है, उतना यह है नहीं। आइए आपको बताते हैं कि ट्रंप का प्रोजेक्ट फ्रीडम क्या है? क्यों कहा जा रहा है कि यह पहले के अभियानों की तरह फेल हो जाएगा? और अमेरिकी मीडिया ने क्यों ईरान को अमेरिका से बेहतर देश बताया है।
अमेरिका और ईरान के बीच 8 अप्रैल 2026 को 15 दिनों के लिए एक अस्थायी सीजफायर हुआ था। इसके बाद पाकिस्तान की मध्यस्थता में दोनों देशों के बीच स्थायी शांति स्थापित करने के लिए बातचीत की शुरुआत भी हुई। लेकिन परमाणु कार्यक्रम, संवर्धित यूरेनियम और स्ट्रेट ऑफ होर्मुज खोलने के मुद्दे पर बात अटक गई। इसके बाद से दोनों देश एक दूसरे को कई बार अलग-अलग प्रस्ताव भेज चुके हैं, लेकिन किसी पर भी सहमति नहीं बन पाई और तनाव जस का तस बना हुआ है।
इसी बीच डोनाल्ड ट्रंप ने 3 मई की रात अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ट्रुथ सोशल पर पोस्ट करते हुए लिखा कि अमेरिकी फौज स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में प्रोजेक्ट फ्रीडम चलाने जा रही है। इसके तहत अमेरिकी नौसेना होर्मुज में फंसे 1500 से अधिक जहाजों को सुरक्षित निकलने के लिए रास्ता बनाएगी। ट्रंप के ऐलान के बाद अमेरिकी मीडिया ने दावा किया कि प्रोजेक्ट फ्रीडम के तहत अमेरिका अपने कई डिस्ट्रॉयर जहाजों को भी तैनात करेगा। इसके बाद से लगने लगा कि अमेरिका और ईरान से बीच जंग एक बार फिर शुरू हो जाएगी।
हालांकि, ट्रंप के ऐलान के बाद अमेरिकी सेना का सेंट्रल कमांड (CENTCOM) सामने आया और उसने साफ किया कि वे होर्मुज में कोई भी सैन्य कार्रवाई नहीं करेंगे। CENTCOM ने होर्मुज में फंसे जहाजों को ओमान के रास्ते बाहर निकलने की सलाह भी दी है, साथ ही यह भी कहा कि अगर उन्हें कोई परेशानी हो तो वो ओमानी अधिकारियों से मदद लें। CENTCOM के बयान से साफ हो गया कि प्रोजेक्ट फ्रीडम के तहत अमेरिका ऐसा कोई कदम नहीं उठाने वाला जिससे होर्मुज में फंसे जहाज बिना किसी डर के निकल सकें।
स्ट्रेट ऑफ होर्मुज ईरान और ओमान के बीच 35 किलोमीटर एक सकरा समुद्री रास्ता है। इस रास्ते में कई इलाके ऐसे हैं जहां समुद्री की गहराई बहुत अधिक है, तो कई इलाके उथले हैं। सामान्य स्थिति में कार्गो जहाज ओमान के रास्ते फारस की खाड़ी में प्रवेश करते हैं और ईरान की ओर से बाहर निकलते हैं। लेकिन अब जब जंग चल रही है और ईरान पिछले 68 दिन से स्ट्रेट ऑफ होर्मुज पर नाकेबंदी कर रखी है तो इस रास्ते से गुजरना मुस्किल हो गया है। क्योंकि अगर कोई जहाज ओमान के रास्ते से भी निकलने की कोशिश करता है तो ईरान उस पर मिसाइल और ड्रोन से हमला बोल देता है।
सीजफायर लागू होने के बाद ऐसे कई मौके आए जब किसी देश के जहाज ने स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से निकलने की कोशिश की, तो इसके जवाब में ईरान ने हवाई हमला किया और फिर उस जहाज को मजबूरन वापस यू-टर्न लेना पड़ा। ट्रंप के ऐलान के बाद हाल ही में साउथ कोरिया का एक तेल टैंकर होर्मुज से बाहर निकलने की कोशिश कर रहा था, जिस पर ईरान ने ताबड़तोड़ मिसाइलें दागकर न सिर्फ उसे रुकने पर मजबूर किया, बल्कि हमले से टैंकर को भारी नुकसान भी हुआ। इस घटना से साफ हो गया कि ईरान की इजाज़त के बिना होर्मुज़ से सुरक्षित बाहर निकलना लगभग नामुमकिन है।
साउथ कोरिया के तेल टैंकर के साथ हुई घटना से ये तो साफ है कि होर्मुज पर ईरान के कब्जे का दावा ट्रंप के दावों से मजबूत है और वो अकेले सैन्य कार्रवाई के दम पर इस सम्स्या को हल नहीं कर सकते हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति के पास इसके अलावा तीन रास्ते बचते हैं।
हालांकि, इसमें कोई भी रास्ता आसान नहीं है। ट्रंप ईरान के साथ अपनी शर्तों पर समझौता करना चाहते हैं। अगर उन्हें ईरान की शर्तों पर समझौता करना ही होता तो ये रास्ता सीजफायर के बाद से ही खुला हुआ है। दूसरे विकल्प की बात करें तो इससे पहले ट्रंप ने एक नहीं दो बार जापान, चीन, फ्रांस, जर्मनी और ब्रिटेन जैसे देशों की मदद की अपील की थी। लेकिन कोई भी अमेरिका की मदद के लिए आगे नहीं आया। इसके पीछे ट्रंप के पहले के कई विवादित फैसले तो जिम्मेदार है ही, इसके अलावा कोई भी देश ईरान के साथ सीधे युद्ध में शामिल नहीं होना चाहता है।
इन दो विकल्पों के अलावा तीसरा विकल्प सैन्य कार्रवाई का बचता है। लेकिन अमेरिकी मीडिया की रिपोर्ट के मुताबिक ट्रंप खुद सैन्य कार्रवाई करने से बचना चाहते हैं। पेटागन की रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिका इस युद्ध में अब तक 25 अरब डॉलर (भारतीय रुपयों में 2 लाख करोड़) से अधिक खर्च कर चुका है। अमेरिका में महंगाई अपने चरम पर है; ऐसे में फिर से युद्ध की शुरुआत करने से जनता नाराज हो सकती है।
द न्यूयॉर्क टाइम्स की रिपोर्ट के अनुसार, एक सैन्य अधिकारी ने दावा किया है कि अमेरिका को अब तक अरबों का नुकसान हो चुका है। इस युद्ध में अब तक अमेरिका को 16-39 विमान नष्ट हुए हैं। इनमें हर एक विमान की कीमत अरबों में थी। जबकि ईरान को अमेरिका के मुकाबले काफी आर्थिक नुकसान उठाना पड़ा है। इसकी सबसे बड़ी वजह ईरान द्वारा खुद के सस्ते और सटीक मिसाइलों और ड्रोन का उत्पादन करना है। रिपोर्ट में कहा गया कि अमेरिकी अर्थव्यवस्था फिलहाल इस स्थिति में नहीं है कि वो इतने महंगे युद्ध का बोझ उठा सके।
विशेषज्ञों के अनुसार, अगर ईरान के साथ जारी युद्ध जल्द ही समाप्त नहीं होता है तो इस अमेरिका की अर्थव्यवस्था पर तो बुरा असर पड़ेगा ही। साथ ही नवंबर में होने वाली मिड टर्म इलेक्शन पर भी पड़ेगा। हालांकि, इस चुनाव में हार या जीत से डोनाल्ड ट्रंप की कुर्सी पर तो कोई असर नहीं पड़ेगा।
ट्रंप की पार्टी अगर मिड टर्म इलेक्शन हार जाती है तो इससे उनकी की शक्तियों पर जरूर असर पड़ेगा और ट्रंप को अपने पूरे कार्यकाल में हर बड़े फैसले के लिए अमेरिकी कांग्रेस की इजाजत लेना जरूरी हो जाएगा। यही कारण है कि ट्रंप इस युद्ध को जल्द से जल्द खत्म करना चाहते हैं ताकि वो मिड टर्म इलेक्शन में इसे जनता के सामने अपनी बड़ी जीत के तौर पर पेश कर सके और वोट हासिल कर सके। हालांकि, ईरान का अड़ियल रवैया उनके इरादों पर पानी फेरने का काम करता नजर आ रहा है।