UN में रूस ने भारत के खिलाफ वोट क्यों किया? पाकिस्तान का दिया साथ; 5 प्वॉइंट में जानें

Pakistan Arms Control Proposal: संयुक्त राष्ट्र में पाकिस्तान और बेलारूस के हथियार नियंत्रण प्रस्ताव को 180 देशों का समर्थन मिला। भारत-इजरायल ने विरोध किया, जबकि रूस, अमेरिका और चीन इसके पक्ष में रहे।
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पीएम मोदी, प्रेसिडेंट पुतिन और पाक पीएम शहबाज शरीफ।सोर्स: गूगल
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  • UN में पाकिस्तान के प्रस्ताव को 180 देशों का समर्थन, भारत और इजरायल ने किया विरोध।

  • रूस, अमेरिका और चीन ने प्रस्ताव के पक्ष में किया मतदान, भारत की सुरक्षा चिंताओं पर उठे सवाल।

  • भारत ने क्षेत्रीय सैन्य संतुलन और दक्षिण एशिया में हथियार नियंत्रण के प्रस्तावित ढांचे पर जताई आपत्ति।

Why Russia Vote Against India in UN: संयुक्त राष्ट्र महासभा की प्रथम समिति में पारंपरिक हथियारों पर नियंत्रण को लेकर पेश किए गए पाकिस्तान और बेलारूस के एक प्रस्ताव ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चर्चा छेड़ दी है। इस प्रस्ताव को अमेरिका, चीन और रूस समेत दुनिया के 180 देशों का समर्थन मिला, जबकि भारत और इजरायल ने इसके खिलाफ मतदान किया। खास बात यह है कि भारत के पारंपरिक रणनीतिक साझेदार रूस ने भी इस प्रस्ताव के पक्ष में वोट दिया। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि आखिर भारत ने पाकिस्तान समर्थित इस प्रस्ताव का विरोध क्यों किया और रूस ने इसका समर्थन क्यों किया? क्या रूस का यह रुख भारत की सुरक्षा चिंताओं के खिलाफ है?

दरअसल, संयुक्त राष्ट्र महासभा की प्रथम समिति में मंगलवार 3 नवंबर को 'कन्वेंशनल आर्म्स कंट्रोल एट द रीजनल एंड सबरीजनल लेवल्स' शीर्षक वाला मसौदा प्रस्ताव पेश किया गया था। इसे पाकिस्तान और बेलारूस ने मिलकर प्रस्तुत किया था। 193 सदस्यीय संयुक्त राष्ट्र महासभा में इस प्रस्ताव के समर्थन में 180 वोट पड़े, जबकि भारत और इजरायल ने इसके विरोध में मतदान किया। किसी भी देश ने वोटिंग से दूरी नहीं बनाई।

प्रस्ताव को मिले भारी समर्थन के बाद पाकिस्तान ने इसे अपनी बड़ी कूटनीतिक कामयाबी बताया। हालांकि, भारत ने स्पष्ट किया कि पारंपरिक हथियारों पर नियंत्रण जैसे संवेदनशील मुद्दे को केवल क्षेत्रीय और उप-क्षेत्रीय व्यवस्थाओं तक सीमित नहीं किया जा सकता। भारत का मानना है कि उसकी सुरक्षा चुनौतियां किसी एक क्षेत्र की भौगोलिक सीमाओं तक सीमित नहीं हैं।

भारत ने पाकिस्तान के प्रस्ताव का विरोध क्यों किया?

संयुक्त राष्ट्र में भारत के विरोध की वजह बताते हुए भारतीय स्थायी मिशन के प्रथम सचिव अनमोल शेर बेदी ने कहा कि पारंपरिक हथियारों पर नियंत्रण एक वैश्विक विषय है। इसलिए इस पर चर्चा और समाधान का दायरा भी व्यापक होना चाहिए।

बेदी ने सवाल उठाया कि क्या इस मुद्दे को मुख्य रूप से क्षेत्रीय और उप-क्षेत्रीय व्यवस्थाओं के माध्यम से ही आगे बढ़ाया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि भारत इस दृष्टिकोण से पूरी तरह सहमत नहीं है।

भारत की आपत्ति का एक बड़ा कारण यह भी था कि प्रस्ताव में संयुक्त राष्ट्र निरस्त्रीकरण आयोग (UN Disarmament Commission) को पारंपरिक हथियारों पर नियंत्रण से जुड़े क्षेत्रीय समझौतों के लिए नए सिद्धांत और ढांचा तैयार करने का सुझाव दिया गया था।

भारत का कहना था कि आयोग इस विषय पर पहले ही तीन बार सर्वसम्मति से दिशानिर्देश और सिफारिशें तैयार कर चुका है। इनमें 1993 में अपनाए गए क्षेत्रीय निरस्त्रीकरण के दिशा-निर्देश, 1999 में पारंपरिक हथियारों पर नियंत्रण और निरस्त्रीकरण से संबंधित दिशा-निर्देश तथा 2017 में पारंपरिक हथियारों के क्षेत्र में व्यावहारिक विश्वास बहाली के उपाय शामिल हैं।

बेदी ने नए सिरे से दिशानिर्देश तैयार करने के प्रस्ताव पर हैरानी जताते हुए कहा कि जब इसी विषय पर आयोग पहले ही तीन सर्वसम्मत नतीजे दे चुका है, तो उससे दोबारा बिल्कुल शुरुआत से काम करने के लिए क्यों कहा जा रहा है?

उन्होंने कहा कि भारत यह समझने में असमर्थ है कि जिस विषय पर पहले ही विस्तार से विचार-विमर्श हो चुका है, उस पर एक और चर्चा की आवश्यकता क्यों है।

भारत की दूसरी बड़ी चिंता क्षेत्रीय सैन्य संतुलन को लेकर थी। बेदी के मुताबिक, सुरक्षा संबंधी चिंताएं केवल सीमित भौगोलिक क्षेत्रों तक नहीं रहतीं। सैन्य क्षमताएं और रणनीतिक हित कई बार क्षेत्रीय सीमाओं से बहुत आगे तक फैले होते हैं। ऐसे में किसी क्षेत्र या उप-क्षेत्र में सैन्य संतुलन बनाए रखने की अवधारणा व्यावहारिक नहीं लगती।

Anmol Sher Bedi, First Secretary at the Permanent Mission of India to the United Nations
अनमोल शेर बेदी, संयुक्त राष्ट्र में भारत के स्थायी मिशन में प्रथम सचिव।सोर्स: @bedi_sher

पाकिस्तान के प्रस्ताव में क्या कहा गया है?

पाकिस्तान और बेलारूस की ओर से पेश किए गए मसौदा प्रस्ताव का मुख्य उद्देश्य पारंपरिक हथियारों पर नियंत्रण के लिए क्षेत्रीय और उप-क्षेत्रीय व्यवस्थाओं को बढ़ावा देना है। प्रस्ताव में कहा गया है कि अंतरराष्ट्रीय शांति और सुरक्षा के सामने मौजूद कई चुनौतियां पड़ोसी देशों के बीच तनाव और आपसी अविश्वास से पैदा होती हैं।

ऐसे में क्षेत्रीय स्तर पर हथियार नियंत्रण के समझौते किए जाने चाहिए। इसमें ऐसे समझौतों को प्रोत्साहित करने की बात कही गई है, जिनके माध्यम से हथियारों और सैन्य बलों की संख्या को न्यूनतम संभव स्तर पर रखते हुए क्षेत्रीय सुरक्षा को मजबूत किया जा सके।

प्रस्ताव में अधिक सैन्य क्षमता रखने वाले देशों की विशेष जिम्मेदारी तय करने की बात भी कही गई है। इसके मुताबिक, सैन्य रूप से महत्वपूर्ण और अधिक क्षमताओं वाले देशों को ऐसे समझौतों को आगे बढ़ाने में विशेष भूमिका निभानी चाहिए।

यही वह बिंदु है, जिस पर भारत की आपत्ति महत्वपूर्ण हो जाती है। भारत का मानना है कि क्षेत्रीय सैन्य संतुलन की व्यवस्था उसकी व्यापक सुरक्षा जरूरतों को नजरअंदाज कर सकती है। भारत की सुरक्षा चुनौतियां केवल पाकिस्तान या दक्षिण एशिया तक सीमित नहीं हैं। ऐसे में हथियारों पर नियंत्रण के लिए किसी क्षेत्र विशेष के आधार पर ढांचा तैयार करना उसके लिए स्वीकार्य नहीं है।

Pakistan Representative Tahir Andrabi with Bangladesh Representative to the United Nations, Riaz Hamidullah
पाकिस्तान के स्थायी प्रतिनिधि ताहिर अंद्राबी, संयुक्त राष्ट्र में बांग्लादेश के स्थायी प्रतिनिधि रियाज हमीदुल्लाह के साथ।सोर्स: @BDPM_Geneva
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रूस ने भारत के खिलाफ वोट क्यों दिया?

इस पूरे घटनाक्रम में सबसे ज्यादा चर्चा रूस के रुख को लेकर हो रही है। भारत और रूस के बीच दशकों पुराने रक्षा और रणनीतिक संबंध हैं। रूस भारत के सबसे महत्वपूर्ण रक्षा साझेदारों में शामिल रहा है। इसके बावजूद उसने पाकिस्तान और बेलारूस के प्रस्ताव का समर्थन किया।

हालांकि, रूस के इस मतदान को भारत के खिलाफ या पाकिस्तान के पक्ष में किसी विशेष कूटनीतिक कदम के तौर पर देखना उचित नहीं होगा।

उपलब्ध जानकारी के मुताबिक, रूस ने 2025 में भी इसी प्रस्ताव के पिछले संस्करण का समर्थन किया था। इससे संकेत मिलता है कि उसका रुख किसी नई रणनीतिक परिस्थिति की वजह से नहीं, बल्कि पारंपरिक हथियार नियंत्रण से जुड़े उसके व्यापक दृष्टिकोण का हिस्सा हो सकता है।

हालांकि, 2 नवंबर 2026 को हुए मतदान में रूस ने समर्थन क्यों दिया, इस बारे में उसकी ओर से कोई आधिकारिक स्पष्टीकरण सामने नहीं आया है।

यहां यह समझना भी जरूरी है कि इस प्रस्ताव में भारत के रक्षा सौदों पर रोक लगाने, हथियारों की खरीद सीमित करने या भारत और पाकिस्तान के बीच सैन्य समानता स्थापित करने का कोई बाध्यकारी प्रावधान नहीं है।

इसका उद्देश्य क्षेत्रीय स्तर पर हथियार नियंत्रण के सिद्धांतों और समझौतों को प्रोत्साहित करना है। संयुक्त राष्ट्र के किसी सामान्य प्रस्ताव का समर्थन करना और किसी कानूनी रूप से बाध्यकारी संधि के तहत प्रतिबंध स्वीकार करना दो अलग-अलग बातें हैं।

इसलिए रूस के समर्थन को भारत की रक्षा खरीद या उसकी सैन्य क्षमताओं के खिलाफ किसी फैसले के रूप में देखना सही नहीं होगा।

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रूस के विदेश मंत्री सर्गेई लावरोफ 20 फ़रवरी, 2018 को मॉस्को दौरे पर पहुंचे पाकिस्तान विदेश मंत्री ख़्वाजा मोहम्मद आसिफ का स्वागत करते हुए।सोर्स: सोशल मीडिया।

भारत ने दक्षिण एशिया के जिक्र वाले पैराग्राफ का भी किया विरोध

भारत ने केवल पूरे प्रस्ताव के खिलाफ मतदान ही नहीं किया, बल्कि दक्षिण एशिया में पारंपरिक हथियारों पर नियंत्रण से जुड़ी पहलों का उल्लेख करने वाले एक विशेष पैराग्राफ का भी विरोध किया। समाचार एजेंसी पीटीआई की रिपोर्ट के मुताबिक, भारत ने इस पैराग्राफ पर अलग से नकारात्मक वोट दर्ज कराया।

इस पैराग्राफ में दुनिया के अलग-अलग क्षेत्रों में पारंपरिक हथियारों पर नियंत्रण के लिए की गई पहलों का उल्लेख था। इनमें लैटिन अमेरिकी देशों के बीच हुई चर्चाओं के साथ दक्षिण एशिया में इस तरह के नियंत्रण के लिए दिए गए प्रस्ताव भी शामिल थे।

इसका उद्देश्य क्षेत्रीय स्तर पर हथियारों की सीमा निर्धारित करके स्थिरता और सुरक्षा को बढ़ावा देने के प्रयासों को प्रासंगिक बताना था।

भारत ने इसका विरोध इसलिए किया क्योंकि वह पूरे प्रस्ताव के मूल दृष्टिकोण से ही असहमत था। भारत नहीं चाहता कि दक्षिण एशिया को ऐसे क्षेत्र के रूप में प्रस्तुत किया जाए, जहां सैन्य क्षमताओं और हथियारों पर नियंत्रण के लिए किसी विशेष क्षेत्रीय संतुलन की व्यवस्था लागू की जाए।

पाकिस्तान ने बताया अपनी बड़ी कूटनीतिक जीत

प्रस्ताव को भारी समर्थन मिलने के बाद पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय ने बयान जारी कर इसे अपनी बड़ी उपलब्धि बताया। पाकिस्तान ने कहा कि संयुक्त राष्ट्र महासभा की प्रथम समिति में उसके प्रस्तावों को व्यापक अंतरराष्ट्रीय समर्थन मिला है।

पाकिस्तान के मुताबिक, क्षेत्रीय और उप-क्षेत्रीय संदर्भ में विश्वास बहाली के उपायों से जुड़े प्रस्ताव को बिना मतदान के स्वीकार किया गया, जबकि पारंपरिक हथियारों पर नियंत्रण से जुड़े प्रस्ताव को 180 मतों से मंजूरी मिली।

पाकिस्तान ने दावा किया कि वह दशकों से संयुक्त राष्ट्र में पारंपरिक हथियार नियंत्रण, विश्वास बहाली के उपायों और क्षेत्रीय निरस्त्रीकरण जैसे मुद्दों को प्राथमिकता के साथ उठाता रहा है।

संयुक्त राष्ट्र में पाकिस्तान के स्थायी प्रतिनिधि ताहिर अंद्राबी ने भी सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर इस सफलता पर खुशी जाहिर की। उन्होंने कहा कि प्रथम समिति में पाकिस्तान की अगुवाई वाले तीन प्रस्तावों को व्यापक समर्थन मिला है।

अंद्राबी के मुताबिक, निरस्त्रीकरण सम्मेलन के अध्यक्ष के रूप में पाकिस्तान ने सम्मेलन की रिपोर्ट से संबंधित प्रस्ताव का मसौदा तैयार करने और उस पर बातचीत की प्रक्रिया का भी नेतृत्व किया। इस प्रस्ताव को 135 देशों के समर्थन से मंजूरी मिली।

कुल मिलाकर, इस मतदान ने एक बार फिर भारत और पाकिस्तान के बीच सुरक्षा संबंधी दृष्टिकोण के अंतर को सामने ला दिया है। जहां पाकिस्तान क्षेत्रीय स्तर पर हथियार नियंत्रण और सैन्य संतुलन को बढ़ावा देना चाहता है, वहीं भारत का जोर इस बात पर है कि सुरक्षा चुनौतियों का आकलन व्यापक वैश्विक और रणनीतिक संदर्भ में किया जाना चाहिए। रूस, अमेरिका और चीन जैसे देशों का पाकिस्तान समर्थित प्रस्ताव के पक्ष में मतदान करना भी इसी बहस को और महत्वपूर्ण बनाता है।

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