

Islamic NATO Defense Pact: सऊदी अरब, पाकिस्तान और तुर्की ने मक्का में एक रक्षा समझौते पर हस्ताक्षर किए हैं, जिसे ‘इस्लामिक नाटो’ भी कहा जा रहा है। इस समझौते का मुख्य उद्देश्य तीनों सुन्नी देशों के बीच रक्षा सहयोग को मजबूत करना और क्षेत्रीय स्थिरता को बढ़ावा देना है।
तुर्की के विदेश मंत्री हाकान फिदान ने स्पष्ट किया कि यह समझौता किसी भी विशेष देश के खिलाफ नहीं है। उन्होंने बताया कि किसी भी सदस्य देश पर हमला होने की स्थिति में तीनों देश तब तक सैन्य कार्रवाई नहीं करेंगे जब तक कि पीड़ित देश द्वारा औपचारिक रूप से मदद का अनुरोध न किया जाए।
यह मक्का संयुक्त रक्षा समझौता कई मायनों में ऐतिहासिक माना जा रहा है, क्योंकि यह तेल समृद्ध सऊदी अरब, परमाणु शक्ति संपन्न पाकिस्तान और मजबूत सैन्य ताकत वाले तुर्की को एक साथ लाता है। तुर्की के पास नाटो की दूसरी सबसे बड़ी सेना और अत्याधुनिक ड्रोन तकनीक है, जिसका फायदा इस नए गठबंधन को मिलेगा।
ईरान और सऊदी अरब के बीच बढ़ते तनाव के दौर में इस समझौते को सऊदी के लिए एक महत्वपूर्ण सुरक्षा कवच के रूप में देखा जा रहा था। हाल ही में ईरान द्वारा सऊदी अरब पर दागी गई मिसाइलों के बाद इस गठबंधन को काफी महत्व दिया गया, जिसे ‘इस्लामिक नाटो’ भी कहा जा रहा है।
तुर्की के विदेश मंत्री हाकान फिदान ने बताया कि समझौते के दस्तावेज में किसी साझा खतरे या दुश्मन को लिखित रूप में परिभाषित नहीं किया गया है। उन्होंने कहा कि जब तक कोई देश हमारे खिलाफ शत्रुतापूर्ण कार्रवाई नहीं करता, तब तक उसे इस गठबंधन द्वारा निशाना या दुश्मन नहीं माना जाएगा।
फिदान ने इस आपसी रक्षा समझौते की धारा को नाटो के अनुच्छेद 5 के तकनीकी रूप से समान बताया, जिसके तहत एक सदस्य पर हमला होने पर अन्य मदद करते हैं। हालांकि, सहायता का स्तर खतरे के पैमाने के आधार पर खुफिया जानकारी साझा करने से लेकर सैन्य तैनाती तक हो सकता है।
इस नए रक्षा समझौते के तहत तीनों देशों के विदेश और रक्षा मंत्री अपने सैन्य प्रमुखों के साथ नियमित रूप से समिति की बैठकें आयोजित करेंगे। इसके अलावा, सहयोग को सुचारू रूप से चलाने के लिए सऊदी अरब में एक स्थायी सचिवालय स्थापित करने का निर्णय भी लिया गया है।
तुर्की के विदेश मंत्री ने यह भी खुलासा किया कि कई अन्य देशों ने इस नए गठबंधन में शामिल होने की अपनी गहरी इच्छा व्यक्त की है। उन्होंने उम्मीद जताई कि आने वाले समय में अगले चरण के दौरान मिस्र भी इस समझौते का हिस्सा बन सकता है, जिससे यह गुट और मजबूत होगा।