ट्रंप का 28-सूत्रीय Peace Plan: बिहार जितनी जमीन खो सकता है यूक्रेन, क्या जेलेंस्की मानेंगे हार?
Trump Ukraine Deal: डोनाल्ड ट्रंप के 28 सूत्रीय शांति प्रस्ताव से यूक्रेन का भूगोल बदल सकता है। इस समझौते के तहत यूक्रेन को बिहार राज्य के बराबर यानी अपने कुल भूभाग का 20% हिस्सा खोने का खतरा है।
- Written By: प्रिया सिंह
डोनाल्ड ट्रंप के 28 सूत्रीय शांति प्रस्ताव से बदल सकता है यूक्रेन का भूगोल (सोर्स- सोशल मीडिया)
Ukraine Territorial Loss 2025: रूस और यूक्रेन के बीच तीन साल से जारी भीषण युद्ध अब एक निर्णायक और बेहद कठिन मोड़ पर खड़ा है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा पेश किए गए 28 सूत्रीय शांति प्रस्ताव ने पूरी दुनिया में हलचल मचा दी है। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर यूक्रेन इस समझौते पर हस्ताक्षर करता है, तो उसे अपनी एक बड़ी रियासत गंवानी होगी। यह समझौता न केवल यूक्रेन की सीमाएं बदलेगा, बल्कि यूरोप की सुरक्षा और यूक्रेन की भविष्य की राजनीति को भी नया रूप देगा।
भूगोल बदलने वाली शर्तें और क्षेत्रीय नुकसान
डोनाल्ड ट्रंप के शांति प्रस्ताव का सबसे विवादित पहलू ‘यथास्थिति’ (Status Quo) को स्वीकार करना है। इसका मतलब है कि वर्तमान में जिस जमीन पर रूसी सेना का कब्जा है, वह रूस के ही पास रहेगी। सामरिक विशेषज्ञों के अनुसार, यह इलाका लगभग 94,000 वर्ग किलोमीटर है, जो भारत के बिहार राज्य के कुल क्षेत्रफल (94,163 वर्ग किमी) के बराबर है।
इसमें क्रीमिया, लुहांस्क और डोनेट्स्क जैसे महत्वपूर्ण रणनीतिक क्षेत्र शामिल हैं। यह यूक्रेन के कुल क्षेत्रफल का लगभग 20 प्रतिशत हिस्सा है, जिसे खोना जेलेंस्की सरकार के लिए एक बड़ा ऐतिहासिक और भावनात्मक झटका होगा।
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सैन्य कटौती और नाटो सदस्यता पर पाबंदी
ट्रंप के प्रस्ताव में केवल जमीन का ही सौदा नहीं है, बल्कि यूक्रेन की सैन्य शक्ति को भी सीमित करने की बात कही गई है। प्रस्ताव के अनुसार, यूक्रेन की सेना (Armed Forces) की संख्या को अधिकतम 6 लाख तक सीमित किया जा सकता है, जबकि वर्तमान में यह संख्या काफी अधिक है।
सबसे बड़ी शर्त यह है कि यूक्रेन भविष्य में कभी भी नाटो (NATO) का हिस्सा नहीं बन पाएगा। बदले में अमेरिका और पश्चिमी देश यूक्रेन को सुरक्षा की गारंटी तो देंगे, लेकिन यह नाटो की ‘आर्टिकल 5’ जैसी मजबूत सुरक्षा नहीं होगी, जिससे यूक्रेन की भविष्य की सुरक्षा पर सवालिया निशान लग रहे हैं।
भारी जान-माल का नुकसान और आर्थिक मजबूरी
इस युद्ध ने दोनों देशों को मानवीय स्तर पर अपूरणीय क्षति पहुंचाई है। आंकड़ों के अनुसार, यूक्रेन ने अब तक 3 लाख से अधिक सैनिक खोए हैं या वे घायल हुए हैं, जबकि रूसी पक्ष में भी यह आंकड़ा 1.5 लाख के पार है। यूक्रेन की अर्थव्यवस्था और बुनियादी ढांचा (इन्फ्रास्ट्रक्चर) पूरी तरह तबाह हो चुका है।
पश्चिमी देशों से मिलने वाली मदद में अनिश्चितता और युद्ध की थकान ने राष्ट्रपति जेलेंस्की को इस समझौते पर विचार करने के लिए मजबूर कर दिया है। हालांकि जेलेंस्की ने अब तक आधिकारिक तौर पर पूरी जमीन छोड़ने की बात नहीं मानी है, लेकिन बातचीत की मेज पर उनकी स्थिति कमजोर दिखाई दे रही है।
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शांति की राह या रूस का वर्चस्व?
अंतरराष्ट्रीय थिंक-टैंक जैसे आईएसडब्ल्यू (ISW) का मानना है कि यह युद्धविराम रूस को फिर से संगठित होने का मौका दे सकता है। वहीं, ट्रंप प्रशासन का तर्क है कि यह “सेंसलेस वॉर” (बेमतलब की जंग) को रोकने का एकमात्र रास्ता है। प्रस्ताव में रूसी फ्रीज संपत्तियों (करीब 100 अरब डॉलर) को यूक्रेन के पुनर्निर्माण के लिए इस्तेमाल करने का प्रावधान भी है।
हालांकि, यूक्रेन के भीतर इस प्रस्ताव का विरोध भी हो रहा है, क्योंकि लोगों को डर है कि इतनी बड़ी जमीन खोने के बाद देश की संप्रभुता खतरे में पड़ जाएगी। अब पूरी दुनिया की नजर 25 दिसंबर की समय सीमा पर है, जब इस शांति योजना पर अंतिम फैसला होने की संभावना है।
