पाकिस्तान में पत्रकारों की बढ़ी मुश्किलें (सोर्स-सोशल मीडिया)
Press Freedom Crisis In Pakistan: पाकिस्तान में मीडिया जगत इस समय एक अत्यंत कठिन और चुनौतीपूर्ण दौर से गुजर रहा है जहां पत्रकारों को अपनी आवाज उठाने के लिए भारी कीमत चुकानी पड़ रही है। इस समय जारी पाकिस्तान में प्रेस की आजादी पर संकट के कारण अभिव्यक्ति की आजादी अब केवल कागजों तक सीमित होकर रह गई है और धरातल पर पत्रकारों को कड़े कानूनी प्रतिबंधों का सामना करना पड़ रहा है।
‘जर्नलिज्म पाकिस्तान’ की ताजा रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2026 में भी पत्रकारों को डराने और धमकाने के लिए विभिन्न कानूनों का सहारा लिया जा रहा है। इस माहौल ने न केवल व्यक्तिगत सुरक्षा को प्रभावित किया है बल्कि देश के पूरे लोकतांत्रिक ढांचे और सार्वजनिक विमर्श पर भी प्रतिकूल प्रभाव डालना शुरू कर दिया है।
पाकिस्तान में पत्रकारों के खिलाफ प्रिवेंशन ऑफ इलेक्ट्रॉनिक क्राइम्स एक्ट (पेसा) और आपराधिक मानहानि जैसे कानूनों का व्यापक रूप से दुरुपयोग किया जा रहा है। सुरक्षा एजेंसियों का बढ़ता दबाव और कड़ा कानूनी नियंत्रण पत्रकारों को स्वतंत्र रूप से अपना काम करने से लगातार रोक रहे हैं। इसके अलावा ईशनिंदा और आतंकवाद निरोधक प्रावधानों का इस्तेमाल भी रिपोर्टिंग को सीमित करने के एक प्रभावी हथियार के रूप में हो रहा है।
संवेदनशील क्षेत्रीय मुद्दों और राजनीतिक आंदोलनों को कवर करने वाले पत्रकारों को अक्सर शारीरिक हिंसा और गंभीर उत्पीड़न का सामना करना पड़ता है। सुरक्षा अभियानों के दौरान कई रिपोर्टरों को हिरासत में लिया गया है और उनके पेशेवर काम में बाधा डालने की कोशिश की गई है। रिपोर्ट के अनुसार ऐसी घटनाओं के बाद कोई पारदर्शी जांच नहीं होती जिससे व्यवस्था में दंडहीनता की भावना और अधिक मजबूत होती जा रही है।
पाकिस्तान में महिला पत्रकारों को ऑनलाइन माध्यमों पर समन्वित ट्रोलिंग, धमकियों और अपमानजनक टिप्पणियों का सामना करना पड़ रहा है। विशेष रूप से मानवाधिकार और राजनीति पर रिपोर्टिंग करने वाली महिलाओं की पेशेवर साख को जानबूझकर नुकसान पहुंचाने के प्रयास किए जाते हैं। ध्रुवीकृत राजनीतिक वातावरण के कारण यह डिजिटल उत्पीड़न अब एक वैश्विक समस्या के साथ-साथ पाकिस्तान का आंतरिक संकट बन चुका है।
कानूनी, सुरक्षा और आर्थिक दबावों के चलते समाचार कक्षों में अब आत्म-सेंसरशिप एक सामान्य और विवश चलन बन गया है। संपादक अक्सर जोखिम कम करने के लिए खबरों की भाषा को बहुत नरम कर देते हैं या महत्वपूर्ण नाम हटा देते हैं। इस प्रक्रिया से पेशेवर मीडिया पर जनता का भरोसा धीरे-धीरे कम हो रहा है और निष्पक्ष पत्रकारिता की जगह खत्म हो रही है।
बलूचिस्तान और खैबर पख्तूनख्वा जैसे प्रांतों में काम करने वाले पत्रकारों को शहरी केंद्रों के मुकाबले कहीं अधिक खतरे झेलने पड़ते हैं। इन इलाकों में कानूनी सहायता की कमी और कड़े सुरक्षा अभियान स्थानीय मीडिया कर्मियों की मुश्किलें और भी बढ़ा देते हैं। सिंध के दूरदराज इलाकों में भी सीमित संसाधनों और सुरक्षा की कमी के कारण रिपोर्टिंग करना अब जान जोखिम में डालने जैसा है।
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जब मुख्यधारा का मीडिया संवेदनशील मुद्दों पर सीमित कवरेज करता है तो लोग अप्रमाणित स्रोतों और सोशल मीडिया की अफवाहों की ओर मुड़ने लगते हैं। सोशल मीडिया पर फैल रही अटकलों के कारण समाज में तथ्य-आधारित बहस की गुंजाइश लगातार घटती जा रही है। यह स्थिति लंबे समय में सार्वजनिक विमर्श की गुणवत्ता को खराब कर रही है और पेशेवर मीडिया की साख को गहरी चोट पहुंचाती है।
यद्यपि पाकिस्तान का संविधान अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की गारंटी देता है लेकिन व्यावहारिक रूप से स्थिति इसके बिल्कुल विपरीत नजर आती है। शक्तिशाली संस्थानों और धार्मिक मामलों पर रिपोर्टिंग को सीमित करने के लिए कई अघोषित और कठोर प्रतिबंध लागू हैं। सुरक्षा दबाव और डिजिटल पाबंदियों ने प्रेस की आजादी को चारों तरफ से घेरकर एक दमघोंटू वातावरण तैयार कर दिया है।