

Escalating Houthi Attack Saudi Aramco Strikes: यमन के ईरान समर्थित हूती विद्रोहियों ने मंगलवार तड़के सऊदी अरब के कई रणनीतिक इलाकों को निशाना बनाकर मिसाइल और ड्रोन हमले किए। इन हमलों में आभा इंटरनेशनल एयरपोर्ट, किंग खालिद एयर बेस और सऊदी सरकारी तेल कंपनी अरामको की ऊर्जा सुविधाएं शामिल थीं। सऊदी अधिकारियों के मुताबिक, हमलों में कम से कम 73 लोग घायल हुए और कई तेल प्लांट्स में आग लग गई। इस हमले के बाद यमन में हूती विद्रोहियों और सऊदी समर्थित बलों के बीच करीब चार साल से चले आ रहे संघर्षविराम के टूटने की बात सामने आई है।
हूती विद्रोहियों के मीडिया संगठन ‘अंसारुल्लाह’ ने टेलीग्राम पर बयान जारी कर हमलों की जिम्मेदारी लेने का दावा किया। हूतियों के मुताबिक, उनके ड्रोन और मिसाइलों ने सऊदी अरब के नागरिक और आर्थिक ठिकानों को निशाना बनाया।
सऊदी नेतृत्व वाले सैन्य गठबंधन के प्रवक्ता मेजर जनरल तुर्की अल-मल्की ने भी हमलों की पुष्टि की। उनके अनुसार, सऊदी अरब का दक्षिणी क्षेत्र सबसे ज्यादा प्रभावित हुआ। आभा, जाजान, नज्रान और खमीस मुशैत में हमलों के कारण अरामको की कई तेल सुविधाओं को अस्थायी रूप से बंद करना पड़ा।
हूती सैन्य प्रवक्ता ब्रिगेडियर जनरल याह्या सरी ने हमले को सऊदी नेतृत्व वाले गठबंधन की हालिया कार्रवाई का जवाब बताया। हूतियों का आरोप है कि 7 सितंबर को गठबंधन के लड़ाकू विमानों ने यमन के अल-जौफ प्रांत के हज्म शहर स्थित केंद्रीय जेल को निशाना बनाया था।
हूती पक्ष के मुताबिक, इस हवाई हमले में एक बच्चे समेत 11 लोगों की मौत हुई और करीब 20 कैदियों के मलबे में दबे होने की आशंका थी। इसके बाद याह्या सरी ने जवाबी कार्रवाई की चेतावनी दी थी। हालांकि, इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि का उल्लेख स्रोत में नहीं है।
इस बढ़ते तनाव का एक बड़ा कारण यमन का लाल सागर तट और रणनीतिक बाब अल-मंदेब स्ट्रेट भी है। यह समुद्री मार्ग अदन की खाड़ी को लाल सागर, स्वेज नहर और वैश्विक व्यापारिक मार्गों से जोड़ता है।
विशेषज्ञों के अनुसार, क्षेत्र में प्रभाव बढ़ाने की कोशिश संघर्ष को और गंभीर बना सकती है। हूती विद्रोही लंबे समय से सऊदी अरब पर यमन में नाकाबंदी और सैन्य कार्रवाई के जरिए मानवीय संकट बढ़ाने का आरोप लगाते रहे हैं।
ताजा हमले से सऊदी अरब, पाकिस्तान और तुर्की के बीच 7 अगस्त को हुए ‘मक्का डिफेंस पैक्ट’ को लेकर भी सवाल उठे हैं। इस समझौते को कई बार ‘इस्लामिक नाटो’ के तौर पर पेश किया गया है। इसके तहत किसी सदस्य देश पर सशस्त्र हमला होने की स्थिति में साझा सुरक्षा सहयोग की बात कही गई है।
हालांकि, विश्लेषक माइकल कुगेलमैन के मुताबिक इस समझौते में नाटो जैसी स्वत: सैन्य प्रतिक्रिया की बाध्यता नहीं है। यही कारण है कि पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने हमले की निंदा तो की, लेकिन समझौते के तहत किसी सैन्य कार्रवाई का संकेत नहीं दिया।
सऊदी तेल प्रतिष्ठानों और एयरपोर्ट पर हमलों से मध्य पूर्व में सुरक्षा चिंताएं बढ़ गई हैं। अगर लाल सागर और बाब अल-मंदेब क्षेत्र में तनाव लंबे समय तक जारी रहता है, तो समुद्री व्यापार और ऊर्जा आपूर्ति पर भी असर पड़ सकता है। ऐसे में सऊदी अरब और हूतियों के बीच बढ़ता तनाव केवल यमन तक सीमित नहीं रहकर पूरे क्षेत्र की सुरक्षा और वैश्विक ऊर्जा बाजार के लिए चुनौती बन सकता है।