सबसे व्यस्त समुद्री रास्ता होर्मुज जलडमरूमध्य (सोर्स-सोशल मीडिया)
Rising Global Energy Supply Risks: मध्य पूर्व में छिड़ी जंग की आग ने अब दुनिया के सबसे व्यस्त समुद्री रास्ते होर्मुज जलडमरूमध्य को अपनी चपेट में ले लिया है। यहां तैनात ईरानी सेना और अंतरराष्ट्रीय बलों के बीच बढ़ते तनाव ने वैश्विक तेल आपूर्ति की कमर तोड़ दी है। जहाजों का आवागमन लगभग ठप होने से हर तरफ हाहाकार मचा है और लोग आने वाले दिनों की महंगाई को लेकर डरे हुए हैं। बढ़ते वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति जोखिम के इस दौर में अब हर किसी की निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि यह गतिरोध कब और कैसे समाप्त होगा।
ईरान की रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) ने होर्मुज स्ट्रेट पर कड़ा सैन्य पहरा बिठा दिया है जिससे जहाजों का निकलना नामुमकिन हो गया है। बीते 24 घंटों में यहां से केवल 12 जहाज ही गुजर पाए हैं जबकि आम दिनों में यह संख्या 60 के करीब हुआ करती थी। सुरक्षा के नाम पर ईरान ने अब इस रास्ते से गुजरने वाले हर एक जहाज के लिए अपनी अनुमति को अनिवार्य कर दिया है।
इस खतरनाक इलाके में अब ड्रोन बोट और समुद्री बारूदी सुरंगों का खतरा हर पल जहाजों का पीछा कर रहा है जो बेहद डरावना है। अमेरिका ने दावा किया है कि उसने माइन बिछाने वाली ईरान की 16 नौकाओं को नष्ट कर दिया है लेकिन खतरा अभी टला नहीं है। ऐसी स्थिति में बीमा कंपनियों ने भी अपना प्रीमियम कई गुना बढ़ा दिया है जिससे समुद्री व्यापार बहुत अधिक महंगा हो गया है।
होर्मुज स्ट्रेट के इस अवरोध ने अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों को आसमान पर पहुंचा दिया है जहां ब्रेंट क्रूड 100.55 डॉलर प्रति बैरल पर पहुंच गया है। सामान्यतः यहां से रोजाना 1.83 करोड़ बैरल तेल गुजरता था जो अब गिरकर महज 16 लाख बैरल प्रतिदिन रह गया है। आपूर्ति में आई इस भारी कमी ने दुनिया भर की अर्थव्यवस्थाओं के लिए एक बहुत बड़ा और गंभीर संकट खड़ा कर दिया है।
वर्तमान में यहां करीब 350 जहाज फंसे हुए हैं जिनमें से 286 अकेले तेल टैंकर हैं जो अपनी बारी का बेसब्री से इंतजार कर रहे हैं। हालांकि ईरान ने इस तनाव के बीच भी अपने बंदरगाहों से करीब 13 मिलियन बैरल तेल की सप्लाई दुनिया को जारी रखी है। लेकिन यह आपूर्ति वैश्विक जरूरतों को पूरा करने के लिए काफी नहीं है जिससे बाजार में घबराहट का माहौल साफ दिखाई दे रहा है।
दिलचस्प बात यह है कि ईरान केवल उन्हीं जहाजों को रास्ता दे रहा है जिनके साथ उसके व्यापारिक और कूटनीतिक संबंध बहुत गहरे और मजबूत हैं। विशेष रूप से चीन के जहाजों को आसानी से निकलने की अनुमति मिल रही है क्योंकि चीन ईरान का एक बड़ा आर्थिक साझेदार है। अपनी सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए कई अन्य देशों के जहाज भी अब खुद को चीन से जुड़ा बता रहे हैं।
समुद्र में सुरक्षा पाने के लिए कई जहाजों ने अपने संचार सिग्नल में “CHINA OWNER” या “ALL CHINESE CREW” जैसे संदेश प्रसारित करना शुरू कर दिया है। यह दिखाता है कि युद्ध के समय में जहाज मालिक अपनी जान और माल बचाने के लिए किस हद तक कूटनीतिक हथकंडे अपना रहे हैं। लेकिन थाईलैंड के “मयूरी नरी” जैसे जहाजों पर हुए हमलों ने यह साबित कर दिया है कि समुद्र अब सुरक्षित नहीं है।
यह भी पढ़ें: इराक के पास अमेरिकी तेल टैंकर पर ईरान का भीषण हमला, एक भारतीय क्रू मेंबर की मौत
इस बढ़ते ऊर्जा संकट को रोकने के लिए अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (IEA) ने अपने आपातकालीन भंडार से 40 करोड़ बैरल तेल जारी करने का ऐलान किया है। इसके साथ ही फ्रांस के नेतृत्व में कई यूरोपीय देश “ऑपरेशन एस्पाइड्स” नाम से एक नया नौसैनिक एस्कॉर्ट मिशन शुरू करने की तैयारी कर रहे हैं। इसका मुख्य उद्देश्य जहाजों को सुरक्षा घेरा प्रदान कर इस रणनीतिक रास्ते को फिर से सुरक्षित और सुचारू बनाना है।
इराक के बसरा और यूएई के पास जहाजों पर बढ़ते हमलों ने पूरी दुनिया को एकजुट होकर सोचने पर मजबूर कर दिया है। जापान के जहाज “ONE Majesty” को भी इस तनावपूर्ण माहौल में मामूली नुकसान पहुंचा है जो स्थिति की गंभीरता को दर्शाता है। अगर समय रहते संवाद और कूटनीति से रास्ता नहीं निकला तो यह तेल संकट पूरी दुनिया को एक गहरी मंदी की ओर धकेल सकता है।