BRICS Summit 2024: ब्राजील के राष्ट्रपति लूला दा सिल्वा ब्रिक्स समिट में नहीं लेंगे हिस्सा, रद्द की रूस यात्रा
ब्राजील के राष्ट्रपति लुइज़ इनासियो लूला दा सिल्वा ब्रिक्स समिट में हिस्सा नहीं लेंगे। उन्होंने अपनी रूस यात्रा को रद्द कर दिया है।
- Written By: साक्षी सिंह
ब्राजील के राष्ट्रपति लुइज़ इनासियो लूला दा सिल्वा ब्रिक्स
साओ पाउलो: ब्राजील के राष्ट्रपति लुइज़ इनासियो लूला दा सिल्वा ब्रिक्स समिट में हिस्सा नहीं लेंगे। उन्होंने अपनी रूस यात्रा को रद्द कर दिया है। लूला दा सिल्वा ने रविवार को घर पर एक दुर्घटना के बाद ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के लिए रूस की यात्रा रद्द कर दी।
राष्ट्रपति कार्यालय के मुताबिक, इस घटना में उनकी गर्दन में चोट लग गई है। लूला को इस सप्ताह मंगलवार से गुरुवार तक रूस के कज़ान शहर में विकासशील देशों के ब्रिक्स संगठन के शिखर सम्मेलन में भाग लेने के लिए जाना था।
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साओ पाउलो में अस्पताल सिरियो लिबनेस ने एक बयान में कहा कि वामपंथी नेता को लंबी दूरी की यात्राएं न करने का निर्देश दिया गया है। लेकिन वह अपनी अन्य गतिविधियों को जारी रख सकते हैं। डॉक्टर रॉबर्टो कलिल और एना हेलेनो जर्मोग्लियो ने कहा कि वे नियमित रूप से लूला के स्वास्थ्य की जांच करेंगे।
वीडियों कॉन्फ्रेंस के जरिए BRICS में लेंगे हिस्सा
ब्राजील के राष्ट्रपति कार्यालय ने एक अलग बयान में कहा कि लूला वीडियो कॉन्फ्रेंस के जरिए ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में हिस्सा लेंगे। साथ ही इस हफ्ते राजधानी ब्रासीलिया में अपना काम जारी रखेंगे। राष्ट्रपति की चोट के कारणों के बारे में कोई जानकारी नहीं दी गई है। बता दें कि ब्राजील ब्रिक्स समूह का एक महत्वपूर्ण हिस्स है।
BRICS समिट के बारे में
शुरूआत में ब्रिक्स (BRICS) पांच देशों वाला समूह था। ये सिर्फ ब्राजील, रूस, इंडिया, चीन और साउथ अफ्रीका वाले देश का समूह था। इसके बाद इसी साल जनवरी में चार और देश सऊदी अरब, ईरान, संयुक्त अरब अमीरात, इथियोपिया और मिस्र समूह में शामिल हुए। अब समूह सदस्य की संख्या 5 से 9 हो चुकी है।
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BRICS समूह गठन का उद्देश्य क्या है
ब्रिक्स समूह से पहले ये ब्रिक समूह था। साल 2006 ब्राजील, रूस, भारत और चीन ने मिलकर ब्रिक समूह बनाया। 2010 में दक्षिण अफ़्रीका भी इसमें शामिल हो गया और यह ब्रिक्स बन गया। इस समूह की स्थापना विश्व के सबसे महत्वपूर्ण विकासशील देशों को एक साथ लाने और उत्तरी अमेरिका और पश्चिमी यूरोप के धनी देशों की राजनीतिक और आर्थिक शक्ति को चुनौती देने के लिए की गई थी।
