

Asim Munir Iran-Saudi Arabia Oil Deal: अमेरिका और ईरान करीब 5 महीने से एक-दूसरे के खिलाफ जंग लड़ रहे हैं। अमेरिका को ईरान के साथ युद्ध में अब तक 37.5 अरब डॉलर (करीब 3.38 लाख करोड़ रुपये) से अधिक का सीधा आर्थिक नुकसान और खर्च उठाना पड़ा है। अमेरिका के अलावा इजरायल और ईरान समेत खाड़ी देशों को भारी नुकसान हुआ है, लेकिन इस युद्ध में एक व्यक्ति ऐसा भी है जिसने अमेरिका-ईरान संघर्ष को पैसे कमाने का जरिया बना लिया है।
टाइम्स ऑफ इजरायल ने हाल ही में पाकिस्तानी सेना के फील्ड मार्शल आसिम मुनीर को को लेकर अपनी एक रिपोर्ट जारी की है। जिसके मुताबिक इस युद्ध से मुनीर को व्यक्तिगत रूप से काफी फायदा हुआ है। रिपोर्ट में दावा किया गया है कि मुनीर ने पाकिस्तानी मशीनरी का इस्तेमाल करके न केवल खुद को देश में मजबूत किया बल्कि पैसे भी कमाए।
टाइम्स ऑफ इजरायल ने अपनी रिपोर्ट में आसिम मुनीर और इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कोर (IRGC) के प्रमुख अहमद वाहिदी के बीच हुई एक सीक्रेट ऑयल डील का खुलासा किया है। रिपोर्ट में बताया गया है कि यह कोई आम समझौता नहीं है, बल्कि एक ऐसा प्राइवेट ऑयल वेंचर है, जिसमें सऊदी अरब की सुरक्षा और ईरान की फिरौती शामिल हैं। दरअसल पाकिस्तान ईरान और सऊदी अरब के बीच बढ़ते तनाव से काफी परेशान था। पाकिस्तान एक तरह ईरान के साथ धर्म और ईमान के नाम पर खड़ा रहा चाहता है, तो वहीं दूसरी तरफ सऊदी अरब से मिलने वाली पैसों की मलाई को भी अपने हाथ से जाने नहीं देना चाहता था।
आसिम मुनीर ने इसी स्थिति का फायदा उठाया और ईरान और सऊदी अरब के बीच एक सीक्रेट ऑयल डील कराने में अहम भूमिका निभाई। जानकारी के मुताबिक यह डील मार्च के अंत में हुई थी। यह वह समय था जब ईरान खाड़ी देशों में मौजूद अमेरिकी सैन्य ठिकानों को निशाना बना रहा था। ईरान ने इस दौरान खाड़ी देशों के बुनियादी ढांचों पर मिसाइलें दागी थीं। मुनीर की मध्यस्थता में हुई इस डील के तहत ईरान सऊदी अरब पर हमला न करने को लेकर तैयार हुआ था और इसके बाद ही ईरान द्वारा सऊदी अरब पर हमले करना लगभग बंद कर दिया था।
रिपोर्ट के मुताबिक, मुनीर और वाहिदी ने एक संयुक्त कारोबार खड़ा किया है, जिसके जरिए पाकिस्तान के रास्ते ईरानी तेल का कथित तौर पर 'ऑफ-द-बुक्स' (अघोषित) निर्यात किया जा रहा है। दावा किया गया है कि इस व्यवस्था के बदले ईरान ने सऊदी अरब पर अपने हमले रोकने का आश्वासन दिया है। रिपोर्ट में यह भी आरोप है कि इस सौदे से मुनीर और वाहिदी दोनों व्यक्तिगत रूप से भारी आर्थिक लाभ कमा रहे हैं। ऐसे में सवाल उठ रहे हैं कि क्या पाकिस्तान के सेना प्रमुख राष्ट्रीय सुरक्षा के नाम पर अपनी निजी तिजोरियां भर रहे हैं?
हालांकि विशेषज्ञों के मुताबिक मुनीर का मकसद ईरान और सऊदी अरब के बीच डील कराकर सिर्फ पैसा कमाना नहीं है, बल्कि वो ऐसे करके सऊदी को इतना मजबूर कर देना चाहते हैं कि रियाद उनके इशारों पर चले। पाकिस्तान पहले ही रक्षा समझौते के नाम पर सऊदी अरब से एक बड़ी डील कर चुका है। जिसके तहत पाकिस्तानी सेना के सैकड़ों जवान सऊदी में तैनात है और तनख्वाह के नाम पर हजारों डॉलर कमा रहे हैं। इस समझौते के चलते मुनीर सऊदी अरब को सुरक्षा प्रदान करने के बहाने अपना खुद का प्राइवेट बिजनेश खोल दिया है।
एक तरफ जहां आसिम मुनीर ईरान और सऊदी अरब के बीच ऑयल डील कराकर पैसा कमाने में लगे हैं। वहीं दूसरी तरफ पाकिस्तानी सरकार भी पैसा कमाने का कोई भी मौका नहीं छोड़ना चाहती। पाकिस्तान ने अमेरिका से 10 अरब डॉलर यानी करीब 96000 करोड़ रुपये की मांग की है। अमेरिकी मीडिया के मुताबिक पाकिस्तान ने अमेरिका से ईरान के साथ युद्ध रुकवाने और मध्यस्थ की भूमिका निभाने के बदले 10 अरब डॉलर की मांग की है।
रिपोर्ट के मुताबिक, पाकिस्तान के वित्त और राजस्व मंत्री मुहम्मद औरंगजेब हाल ही में अमेरिका के दौरे पर गए थे। इस दौरान उनकी मुलाकात वाशिंगटन डीसी में अमेरिका के वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट से हुई। दोनों देशों के वित्त मंत्रियों के बीच इस दौरान कई मुद्दों को लेकर बात हुई और इसी दौरान औरंगजेब ने बेसेंट से पैसों की मांग की।
वह शांति समझौता जो ठीक एक महीने भी नहीं चल पाया और अमेरिका-ईरान फिर से एक-दूसरे पर हमला करना शुरू कर दिया। पाकिस्तान को उसके बदले 96000 करोड़ रुपये और दुनियाभर में वाहवाही दोनों चाहिए। हालांकि अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने पाकिस्तान को पैसे देने की घोषणा नहीं की है। पाकिस्तान इन पैसों के जरिए अपनी ठप हो चुकी अर्थव्यवस्था को फिर से पटरी पर लाना चाहता है।
जानकारी के मुताबिक, यह कोई सामान्य कर्ज या आर्थिक मदद नहीं है, बल्कि करेंसी स्वैप की व्यवस्था है। इसमें अमेरिकी ट्रेजरी पाकिस्तान को सीधे पैसे नहीं देती, बल्कि कुछ समय के लिए अमेरिकी डॉलर और पाकिस्तानी रुपये का आपस में आदान-प्रदान किया जाता है। इससे दुनिया को यह संदेश जाता है कि पाकिस्तान के पास जरूरत पड़ने पर डॉलर की कमी नहीं होगी। इसका फायदा यह होता है कि विदेशी निवेशकों का भरोसा बढ़ता है और देश में दोबारा निवेश आने की संभावना मजबूत होती है। साथ ही, ऐसी व्यवस्था होने पर पाकिस्तान को हर बार आर्थिक मदद के लिए IMF की सख्त शर्तों पर पूरी तरह निर्भर नहीं रहना पड़ सकता।