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ममता की ‘जुझारू छवि’ के सामने BJP की ‘ध्रुवीकरण नीति’, कौन किस पर पड़ेगा भारी? शुरू हुआ बंगाल का सबसे बड़ा रण!
West Bengal Politics: चुनाव तारीखों के ऐलान के साथ ही पश्चिम बंगाल में सत्तारूढ़ पार्टी टीएमसी और विपक्षी बीजेपी समेत विभिन्न राजनीतिक दलों की ताकत और कमजोरी पर चर्चा शुरू हो गई है।
- Written By: अर्पित शुक्ला

PM मोदी और CM ममता बनर्जी
West Bengal Assembly Elections: पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव की तारीखों का ऐलान हो चुका है। चुनाव आयोग ने रविवार को बताया कि राज्य में 23 और 29 अप्रैल को दो चरणों में मतदान होगा। इसके साथ ही राज्य में सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) और विपक्षी भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) समेत विभिन्न राजनीतिक दलों के बारे में चर्चा शुरू हो गई है, जिनकी ताकत और कमजोरियों पर विश्लेषण हो रहा है।
टीएमसी, मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की अगुवाई में, पिछले एक दशक से अधिक समय से राज्य में सत्ता में बनी हुई है। पार्टी की सबसे बड़ी ताकत ममता बनर्जी की प्रभावशाली और जुझारू छवि है, जो राज्य की राजनीति में विपक्षी दलों पर भारी पड़ती है। ममता ने खुद को राज्य स्तर पर एक कद्दावर नेता और राष्ट्रीय स्तर पर विपक्ष की आवाज के रूप में स्थापित किया है।
TMC के लिए अस बार राह आसान नहीं
टीएमसी का संगठनात्मक ढांचा भी मजबूत है। पार्टी के कार्यकर्ता राज्य के हर कोने में, गांवों से लेकर शहरों तक, बूथ-स्तरीय स्तर तक फैले हुए हैं। पंचायत और स्थानीय समितियों के माध्यम से पार्टी ने अपने नेटवर्क को मजबूत किया है। इसके अलावा, टीएमसी ने विभिन्न योजनाओं जैसे लक्ष्मी बंधन, कन्याश्री और स्वास्थ्य साथी के जरिए महिलाओं, ग्रामीण मतदाताओं और आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों को अपनी ओर आकर्षित किया है।
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हालांकि, टीएमसी के सामने कुछ कमजोरियां भी हैं। सत्ता में 15 साल से अधिक समय रहने के बाद पार्टी को सत्ता विरोधी लहर का सामना करना पड़ रहा है। कई जिलों में प्रशासनिक असंतोष, भ्रष्टाचार के आरोप और नेताओं के प्रति नाराजगी बढ़ रही है। पार्टी के अंदर गुटबाजी भी एक बड़ी चुनौती बन चुकी है, जहां जिला स्तरीय नेताओं के बीच प्रतिद्वंद्विता और राजनीतिक प्रभाव के लिए संघर्ष हो रहा है।
BJP की बाहरी पार्टी वाली छवि
बीजेपी इस बार सत्ता विरोधी लहर और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के प्रभावशाली नेतृत्व का लाभ उठाने की कोशिश कर रही है। पार्टी ने हिंदुत्व आधारित ध्रुवीकरण के माध्यम से अपनी पकड़ मजबूत की है, साथ ही भ्रष्टाचार और कानून-व्यवस्था के मुद्दों को भी प्रमुखता दी है। पिछले एक दशक में बीजेपी ने वाम और कांग्रेस के पारंपरिक मतदाताओं को आकर्षित कर खुद को राज्य में मुख्य विपक्षी दल के रूप में स्थापित किया है।
बीजेपी का चुनावी इतिहास अब एक सकारात्मक मोड़ ले चुका है। पार्टी का मत प्रतिशत 39 प्रतिशत से अधिक हो चुका है, और वह 12 सांसदों और 65 से अधिक विधायकों के साथ राज्य की राजनीति में प्रभावी रूप से स्थापित हो चुकी है। हालांकि, पार्टी के लिए कुछ कमजोरियां भी हैं। बीजेपी की बंगाल इकाई में गुटबाजी एक बड़ा मुद्दा है, जो पिछले चुनावों में पार्टी के प्रदर्शन को नुकसान पहुंचा चुका है। इसके अलावा, टीएमसी द्वारा बीजेपी को बाहरी पार्टी के रूप में प्रस्तुत किए जाने का आरोप पार्टी को नुकसान पहुंचा रहा है। बीजेपी की उत्तर भारतीय छवि और एसआईआर पर अत्यधिक जोर भी मतुआ समुदाय जैसे विभिन्न समूहों को दूर कर सकता है।
माकपा का अस्तित्व संकट
मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा) पश्चिम बंगाल में अस्तित्व की लड़ाई लड़ रही है। माकपा की कोशिश है कि वह आगामी लोकसभा चुनावों में थोड़ी बढ़त हासिल कर सके, लेकिन पार्टी का प्रदर्शन 2021 के विधानसभा चुनावों में काफी कमजोर रहा। 2011 तक राज्य में 34 साल तक शासन करने वाली माकपा का वोट प्रतिशत अब घटकर 4.73 प्रतिशत रह गया है। पार्टी की कमजोरियों में घटते जनाधार और नेताओं की उम्रदराज होना प्रमुख है, जिससे पार्टी को आगामी चुनावों में मुश्किलों का सामना करना पड़ सकता है।
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कांग्रेस भी लड़ रही वजूद की लड़ाई
कांग्रेस ने इस बार अपने अकेले चुनाव लड़ने का फैसला किया है और माकपा से गठबंधन खत्म कर दिया है। 2021 के चुनावों में उसे कोई खास सफलता नहीं मिली, लेकिन उत्तर और मध्य बंगाल के कुछ हिस्सों में पार्टी का प्रभाव अब भी कायम है। यदि कांग्रेस इन क्षेत्रों में अच्छे चुनाव प्रचार करती है, तो यह पार्टी के पुनरुत्थान के लिए अहम साबित हो सकता है। हालांकि, कांग्रेस के लिए संगठनात्मक पतन और दलबदल जैसी कमजोरियां भी बड़ी समस्याएं हैं, जो राज्य में पार्टी की पकड़ को कमजोर बना रही हैं।
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