ट्रंप को कोर्ट से तगड़ा झटका! 10% नए टैरिफ को बताया गैरकानूनी, क्या भारत के लिए अब खुलेगा फायदे का रास्ता?
Trump Tariffs Illegal: अमेरिकी संघीय अदालत ने ट्रंप द्वारा लगाए गए 10% अतिरिक्त टैरिफ को अवैध करार दिया है। इस फैसले के बाद वैश्विक बाजार और भारत के साथ व्यापारिक संबंधों पर बड़ा असर पड़ सकता है।
- Written By: अमन उपाध्याय
Trump Tariffs Illegal US Court: अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की व्यापारिक नीतियों को उनकी ही अदालत ने एक बड़ा झटका दे दिया है। अमेरिकी संघीय अदालत ने दुनिया भर से आने वाले सामानों पर लगाए गए 10% अतिरिक्त नए टैरिफ को अमान्य और गैरकानूनी करार दिया है। दो और एक के बहुमत से आए इस ऐतिहासिक फैसले ने वाइट हाउस से लेकर वैश्विक बाजारों तक में खलबली मचा दी है।
अदालत के जज मार्क ए. बरनेट और क्लेयर आर. केली ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि ट्रंप प्रशासन 1974 के व्यापार अधिनियम की धारा 122 का इस्तेमाल केवल व्यापार घाटे को कम करने के लिए नहीं कर सकता है। अदालत का मानना है कि यह कानून 1970 के दशक के ‘भुगतान संतुलन संकट’ से निपटने के लिए बनाया गया था, न कि आज के दौर के सामान्य व्यापार घाटे के लिए। अदालत ने चेतावनी दी कि यदि राष्ट्रपति को ऐसे असीमित अधिकार दिए गए तो यह संवैधानिक उल्लंघन होगा क्योंकि व्यापार नीति तय करने का मुख्य अधिकार अमेरिकी कांग्रेस के पास है।
यह फैसला भारत के लिए एक गेम चेंजर साबित हो सकता है। ग्लोबल ट्रेड रिसर्च इनिशिएटिव (GTRI) के संस्थापक अजय श्रीवास्तव जैसे विशेषज्ञों का मानना है कि जब तक अमेरिका की टैरिफ व्यवस्था कानूनी रूप से स्थिर नहीं हो जाती, तब तक भारत को अमेरिका के साथ द्विपक्षीय व्यापार समझौते की दिशा में बहुत संभलकर कदम उठाने चाहिए। वर्तमान में भारत के सामने चुनौती यह है कि अमेरिका चाहता है कि भारत अपना आयात शुल्क खत्म करे लेकिन वह खुद अपने ‘मोस्ट फेवर्ड नेशन’ (MFN) टैरिफ को कम करने के लिए तैयार नहीं है।
Trump Tariffs Illegal US Court: अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की व्यापारिक नीतियों को उनकी ही अदालत ने एक बड़ा झटका दे दिया है। अमेरिकी संघीय अदालत ने दुनिया भर से आने वाले सामानों पर लगाए गए 10% अतिरिक्त नए टैरिफ को अमान्य और गैरकानूनी करार दिया है। दो और एक के बहुमत से आए इस ऐतिहासिक फैसले ने वाइट हाउस से लेकर वैश्विक बाजारों तक में खलबली मचा दी है।
अदालत के जज मार्क ए. बरनेट और क्लेयर आर. केली ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि ट्रंप प्रशासन 1974 के व्यापार अधिनियम की धारा 122 का इस्तेमाल केवल व्यापार घाटे को कम करने के लिए नहीं कर सकता है। अदालत का मानना है कि यह कानून 1970 के दशक के ‘भुगतान संतुलन संकट’ से निपटने के लिए बनाया गया था, न कि आज के दौर के सामान्य व्यापार घाटे के लिए। अदालत ने चेतावनी दी कि यदि राष्ट्रपति को ऐसे असीमित अधिकार दिए गए तो यह संवैधानिक उल्लंघन होगा क्योंकि व्यापार नीति तय करने का मुख्य अधिकार अमेरिकी कांग्रेस के पास है।
यह फैसला भारत के लिए एक गेम चेंजर साबित हो सकता है। ग्लोबल ट्रेड रिसर्च इनिशिएटिव (GTRI) के संस्थापक अजय श्रीवास्तव जैसे विशेषज्ञों का मानना है कि जब तक अमेरिका की टैरिफ व्यवस्था कानूनी रूप से स्थिर नहीं हो जाती, तब तक भारत को अमेरिका के साथ द्विपक्षीय व्यापार समझौते की दिशा में बहुत संभलकर कदम उठाने चाहिए। वर्तमान में भारत के सामने चुनौती यह है कि अमेरिका चाहता है कि भारत अपना आयात शुल्क खत्म करे लेकिन वह खुद अपने ‘मोस्ट फेवर्ड नेशन’ (MFN) टैरिफ को कम करने के लिए तैयार नहीं है।
