पंचायत चुनाव पर योगी सरकार का बड़ा दांव, बदले हुए नियमों से तय होगी प्रधानी की किस्मत, क्या है ट्रिपल टेस्ट?
UP Panchayat Election 2026: योगी कैबिनेट ने समर्पित पिछड़ा वर्ग आयोग के गठन को मंजूरी दे दी है। अब ट्रिपल टेस्ट फॉर्मूले के आधार पर ही पंचायत चुनावों में आरक्षण तय किया जाएगा।
- Written By: प्रतीक पाण्डेय
OBC Reservation Triple Test: योगी सरकार ने पंचायत चुनावों की तारीखों पर लगी अनिश्चितता को दूर करने की दिशा में पहला और सबसे बड़ा कदम उठा लिया है। अब प्रधानी से लेकर जिला पंचायत तक का सफर पुराने ढर्रे पर नहीं, बल्कि सुप्रीम कोर्ट के बेहद कड़े ‘ट्रिपल टेस्ट’ के जरिए तय होगा।
यह केवल एक प्रशासनिक फैसला नहीं है, बल्कि ग्रामीण सत्ता के समीकरणों को पूरी तरह बदलने वाला ऐतिहासिक मोड़ है, जिसका सीधा असर आपके गांव की राजनीति और आरक्षित सीटों पर पड़ने वाला है।
योगी कैबिनेट की हरी झंडी
सोमवार को हुई कैबिनेट की बैठक में ‘समर्पित पिछड़ा वर्ग आयोग’ के गठन को मंजूरी दे दी गई है। इससे पहले साल 2021 के चुनावों में केवल रैपिड सर्वे के आधार पर सीटें तय कर दी गई थीं, जिसे लेकर काफी कानूनी विवाद हुए थे। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया था कि बिना वैज्ञानिक और अनुभवजन्य आंकड़ों के राजनीतिक आरक्षण नहीं दिया जा सकता।
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अब सरकार ने इस विधिक अड़चन को दूर कर दिया है। इसका मतलब यह है कि अब आरक्षण की सूची हवा-हवाई नहीं होगी, बल्कि आयोग की रिपोर्ट के आधार पर हर जिले की सटीक स्थिति को ध्यान में रखकर तैयार की जाएगी।
क्या हैं तीन कसौटियां जिसे पार करना जरूरी?
सुप्रीम कोर्ट का यह ‘ट्रिपल टेस्ट’ फॉर्मूला तीन मुख्य शर्तों पर टिका है। पहली शर्त है एक समर्पित आयोग का गठन, जो यूपी के गांवों में जाकर ओबीसी वर्ग के पिछड़ेपन की गहन जांच करेगा। दूसरी शर्त यह है कि आयोग द्वारा जुटाए गए जमीनी आंकड़ों के आधार पर ही सीटों का सटीक प्रतिशत तय होगा। और सबसे महत्वपूर्ण तीसरी शर्त यह है कि किसी भी हाल में एससी, एसटी और ओबीसी का कुल आरक्षण 50 प्रतिशत की सीमा को पार नहीं करना चाहिए।
यदि सरकार इन शर्तों को पूरा किए बिना चुनाव कराती है, तो उन सभी ओबीसी सीटों को सामान्य श्रेणी में मान लिया जाएगा, जो राजनीतिक रूप से एक बड़ा जोखिम हो सकता है।
सर्वे-जनगणना की ड्यूटी के बीच उलझा चुनावी कार्यक्रम
आयोग के गठन मात्र से ही कल वोटिंग शुरू नहीं हो जाएगी। शासन की मानें तो जून के पहले सप्ताह तक आयोग में नियुक्तियों का काम पूरा कर लिया जाएगा। इसके बाद असली चुनौती शुरू होगी। आयोग को उत्तर प्रदेश के सभी 75 जिलों के हजारों गांवों में जाकर सर्वे करना होगा, जिसमें कम से कम दो से तीन महीने का वक्त लग सकता है।
आखिर कब बज सकता है गांवों में चुनावी बिगुल
इन सभी तकनीकी और कानूनी प्रक्रियाओं को देखते हुए यह साफ है कि चुनावी मैदान सजने में अभी कुछ महीनों का वक्त और लगेगा। आयोग का कार्यकाल छह महीने तय किया गया है। रिपोर्ट आने के बाद नई आरक्षण सूची यानी रोटेशन पॉलिसी पर आपत्तियां मांगी जाएंगी और उनका निस्तारण होगा।
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इन तमाम समीकरणों को देखकर जानकार मान रहे हैं कि अगले साल होने वाले विधानसभा चुनावों के बाद ही, यानी फरवरी या मार्च के आसपास ही पंचायत चुनावों की आहट सुनाई देगी। तब तक गांवों में प्रधानी की कुर्सी का इंतजार थोड़ा और लंबा हो सकता है, लेकिन यह साफ है कि इस बार चुनाव पूरी तरह विधिक पारदर्शिता के साथ होंगे।
