

Highlights:
सपा की रणनीति और चुनावी तैयारी ने खींचा ध्यान
शिवपाल यादव ने 2027 के विधानसभा चुनाव का किया जिक्र
बैलेट पेपर से मतगणना में क्यों लगा अधिक समय?
आगरा-वाराणसी के नतीजों पर क्यों नजर?
UP MLC Election Analysis BJP V/S Samajwadi Party: यूपी में स्नातक और शिक्षक एमएलसी की 11 सीटों के नतीजों ने यह दिखा दिया है कि अगले विधानसभा चुनाव में बीजेपी की मुश्किलें बढ़ने वाली हैं।सपा 2020 की सीटों से आगे निकली है और इसने उसे अधिक आत्मविश्वास दिया है। हालांकि इन चुनावों में आम वोटर मतदाता नहीं होता। इसलिए इस जीत हार को सीधे सीधे विधानसभा चुनाव से जोड़ कर नहीं देखा जा सकता। लेकिन इन नतीजों ने बीजेपी के लिए खतरे की घंटी तो बजा ही दी है। इसने यह भी बता दिया है कि बीजेपी इन चुनावों को लेकर कितनी गलतफहमी में थी।
इन चुनावों के लिए उम्मीदवारों को काफी समय से तैयारी करनी होती है और वोटर बनवाने पड़ते हैं। शिक्षक सीट के लिए तीन साल से माध्यमिक और उच्च स्तर पर नियुक्त अध्यापक फार्म 19 भर कर वोटर बनते हैं।जबकि स्नातक सीट के लिए तीन साल पहले स्नातक हो चुके व्यक्ति फार्म 18 भरने के बाद वोटर बनते हैं। इस कार्य में संभावित उम्मीदवार अपने अपने स्तर पर वोटर बनवाते हैं। नतीजे बता रहे हैं कि बीजेपी की चुनावी तैयारियों में गंभीरता नहीं थी जबकि मुख्य प्रतिद्वंद्वी सपा अधिक तैयारी और सटीक रणनीति से चुनाव लड़ रही थी। यह सिलसिला अगर विधानसभा चुनाव में भी जारी रहा तो चुनाव नतीजे प्रभावित होने तय हैं।
चुनाव नतीजे बीजेपी के लिए बहुत अनुकूल नहीं रहे फिर भी विपक्ष ने बीजेपी, सरकार और प्रशासन पर मतदान तथा मत गणना में धांधली के कई आरोप लगाये थे। अब नतीजे आने के बाद इन चुनावों का प्रबंधन देख रहे सपा नेता शिवपाल सिंह यादव ने पोस्ट कर कहा कि बीजेपी ने सारे हथकंडे अपनाये थे लेकिन हमारा संघर्ष काम आया। हौसला बुलंद रखिए, मंजिल हमारा इंतजार कर रही है। आज एमएलसी चुनाव, कल 2027 में विधानसभा चुनाव...समाजवादी विजय का शंखनाद हो चुका है। अब 2027 में ऐतिहासिक परिणाम की बारी है।
बीजेपी ने आधिकारिक बयान तो नहीं दिया है, लेकिन उनके नेता चुनाव नतीजे से बहुत दुखी नहीं लग रहे। कुछ तो इन नतीजों को अपनी सफलता बता रहे हैं। हालांकि आगरा और वाराणसी शिक्षक सीट के नतीजे दूरगामी असर डालेंगे। आगरा इसलिए कि वहा समाजवादी पार्टी की कमजोर हो गई स्थिति को इससे मजबूती मिलेगी और वाराणसी इसलिए कि वह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का निर्वाचन क्षेत्र है।
इन चुनावों को अगले विधानसभा चुनाव का सेमीफाइनल कहा जा रहा था और मतगणना में जितना अधिक समय लगा उतनी ही आम वोटर की रुचि भी नतीजे जानने में बढ़ती गई। समय ज्यादा लगने के कारण मतगणना में धांधली के आरोप भी लगे और लोगों के मन में संदेह भी हुऐ। हालांकि समय ज्यादा लगने के पीछे का कारण ईवीएम के बजाय बैलेट पेपर से चुनाव और मतगणना में द्वितीय वरीयता से आगे तक गणना जारी रहना भी है।
इन चुनावों में वोटर को उम्मीदवारों की संख्या के अनुसार वरीयता वोट देने होते हैं। उम्मीदवार के नाम के आगे अपनी पसंद के अनुसार 1, 2 या 3 लिखना होता है। रद्द होने वाले मतपत्रों को अलग करने के बाद कुल वैध मतपत्रों के आधे से अधिक वोट पाने वाले को विजयी घोषित कर दिया जाता है। अगर पहले चक्र में कोई उस संख्या तक नहीं पहुंचता तो फिर अगले चक्र की गणना जारी रहती है। इसी कारण अंतिम नतीजे आने में इतना विलंब हुआ है।
इन चुनावों में वोटर पढ़ा-लिखा होता है इसलिए इन नतीजों को पढ़े लिखों के बीच जनाधार मापने का संकेत भी माना जाता है। इस तरह से देखें तो यह सपा के लिए बहुत संतोषजनक नतीजे रहे हैं। इससे एक निष्कर्ष यह भी निकाला जा सकता है कि अध्यापकों और तीन चार साल पहले स्नातक हुए शिक्षितों के बीच बीजेपी की लोकप्रियता कम हुई है। बीजेपी को अब इस बात पर भी मंथन करना पड़ेगा।
शहरी और पढ़े लिखों के बीच हुए इस चुनाव के बाद बीजेपी को अब पंचायतों के चुनावों में जाना पड़ेगा जो कि ग्रामीण क्षेत्रों के चुनाव होते हैं। भाजपा के लिए वह चुनाव अधिक बड़ा लिटमस टेस्ट होगा।
बीजेपी को एमएलसी चुनाव नतीजों को गंभीरता से लेना होगा। इन चुनावों में असंतुष्टों के रुख, उम्मीदवारों के चयन, संगठन की अरुचि और ठोस रणनीति के अभाव के कारण जो कुछ नुकसान हुआ, वह आगे न हो इसके लिए सबक सीखना ही पड़ेगा। जमीनी रणनीति पर ठोस काम करना पड़ेगा ठीक वैसे ही जैसे सपा ने इन चुनावों में किया है।
रिपोर्ट- गोविंद पंत राजू