UP बीजेपी के नए ‘चौधरी’ के सामने होंगी ये 5 चुनौतियां, पास हुए तो खत्म हो जाएगी सियासत-ए-अनुप्रिया
Pankaj Chaudhary Challenges: यूपी बीजेपी की कमान संभालने के बाद पंकज चौधरी की राह आसान नहीं होने वाली हैं। उनके सामने 2027 विधानसभा चुनाव के साथ-साथ कई बड़ी चुनौतियां सामने होंगी।
- Written By: अभिषेक सिंह
पंकच चौधरी (डिजाइन फोटो)
UP BJP new President: पंकज चौधरी ने उत्तर प्रदेश भाजपा के अध्यक्ष पद के लिए नामांकन दाखिल कर दिया है। सीएम योगी आदित्यनाथ व डिप्टी सीएम केशव प्रसाद मौर्य प्रस्तावक खुद उनके प्रस्तावक बने थे। इसके अलावा कोई दूसरा नामांकन दाखिल नहीं हुआ है। ऐसे में पंकज चौधरी निर्विरोध ही यूपी बीजेपी के अध्यक्ष बन गए हैं। हालांकि उनके नाम का औपचारिक ऐलान कल किया जाएगा।
यूपी बीजेपी की कमान संभालने के बाद पंकज चौधरी की राह आसान नहीं होने वाली हैं। उनके सामने 2027 विधानसभा चुनाव के साथ-साथ कई बड़ी चुनौतियां सामने होंगी। तो चलिए एक-एक कर के विस्तार से जानते हैं कि यूपी बीजेपी के नए ‘चौधरी’ के सामने कौन-कौन से चैलेंज आने वाले हैं।
उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027
पंकज चौधरी के के कार्यकाल में 2027 का विधानसभा चुनाव भी लड़ा जाना है। देश का सबसे बड़ा सियासी सूबा होने के कारण यहां सरकार को बचाए रखना और प्रदर्शन को बेहतर करने की जिम्मेदारी पंकज चौधरी के ऊपर आने वाली है। इस चुनौती से पार पाना उनकी पहली प्राथमिकता होगी।
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पूर्वांचल में बीजेपी को मजबूती देना
पंकज चौधरी को जिन दो कारणों की वजह से यूपी बीजेपी की कमान सौंपी गई है, उनमें अव्वल ये है कि वो कुर्मी समुदाय से आते हैं। दूसरा वह पूर्वांचल से ताल्लुक रखते हैं। 2024 लोकसभा चुनाव में बीजेपी को सपा ने सबसे बड़ा डेंट पूर्वांचल में ही लगाया था। इस लिहाज से पूर्वांचल में भाजपा को मजूबत करना उनकी दूसरी चुनौती होगी।
कुर्मियों के बीच में आत्मनिर्भरता
यूपी बीजेपी के नए अध्यक्ष के तौर पर पंकज चौधरी के सामने तीसरी चुनौती यह भी होगी कि वह कुर्मी वोटरों के बीच में भाजपा को ‘आत्मनिर्भर’ बनाएं। अभी तक उत्तर प्रदेश में ‘कुर्मी वोटरों के महासागर’ में बीजेपी अनुप्रिया पटेल की पार्टी अपना दल (एस) की नाव पर सवार होकर पार उतरने को मजबूर थी। लेकिन अब भूपेन्द्र चौधरी को कमान सौंपकर यह संदेश दिया है कि वह कुर्मियों के बीच आत्मनिर्भर होना चाहती है।
संगठन में सामंजस्य बनाए रखना
भारतीय जनता पार्टी ने लगातार तीसरी बार उत्तर प्रदेश मे संगठन की कमान ओबीसी के हाथ में सौंपी है। यूपी बीजेपी को पहला दलित अध्यक्ष मिलने की उम्मीद एक बार फिर खत्म हो गई है। इस लिहाज से देखें तो पार्टी के अंतर दलित नेताओं में आंतरिक मनमुटाव भी सामने आ सकता है। ऐसे में पंकज चौधरी के सामने संगठन में सामंजस्य बिठाए रखने की भी चुनौती होगी।
अन्य पिछड़ा वर्ग से सही तालमेल
चौधरी के सामने अन्य पिछड़ा वर्ग को साथ लेकर चलने की चुनौती भी होगी। जिसमें कुर्मी के अलावा अन्य जाति के लोग शामिल हैं। पिछड़े वर्ग की इस तरह से पैरवी करने की कोशिश होगी जिस तरह से एक समय में केशव प्रसाद मौर्य किया करते थे, तभी वह पूर्वांचल में भारतीय जनता पार्टी की आकांक्षाओं पर खरा उतर सकते हैं।
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ऐसे में अगर पंकज चौधरी केवल कुर्मी वोटो के भरोसे भाजपा को मजबूत करने की कोशिश करेंगे तो शायद फेल हो जाएं। इसलिए उन्हें कुर्मी बिरादरी के अलावा अन्य जातियों के वोट बैंक भी साधने होंगे और अपने प्रदेश तथा जिला स्तर के संगठन में इन लोगों को महत्वपूर्ण जिम्मेदारी देनी होगी।
