राजनीति में ब्राह्मण को लेकर दांव-पेंच। इमेज-एआई
Brahmins Politics In Bihar And UP : आज के दौर में भले ही छात्र आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और सॉफ्टवेयर इंजीनियरिंग की ओर भाग रहे हों, लेकिन सियासत के मैदान में आज भी ‘सोशल इंजीनियरिंग’ ही सबसे बड़ी डिग्री है। जो इस इंजीनियरिंग में माहिर है, सत्ता की चाबी उसी के पास होती है।
एक दौर था] जब राजनीति सिर्फ दलित और पिछड़ा वर्ग के इर्द-गिर्द घूमती थी, लेकिन वर्तमान परिदृश्य में ब्राह्मण समुदाय भारतीय राजनीति का नया ‘हॉटकेक’ बन गया है। चाहे उत्तर प्रदेश हो या बिहार, ब्राह्मणों को साधे बिना सत्ता का सफर अधूरा माना जा रहा है।
उत्तर प्रदेश में ब्राह्मणों की आबादी लगभग 11 से 13% है, जो सवर्णों में सबसे बड़ा हिस्सा है। राज्य की 100 से अधिक विधानसभा सीटों पर यह समुदाय हार-जीत तय करने की ताकत रखता है। यही कारण है कि ‘PDA’ (पिछड़ा-दलित-अल्पसंख्यक) की बात करने वाले अखिलेश यादव भी अब ब्राह्मणों की चिंता में ‘दुबले’ हो रहे हैं। माता प्रसाद पांडेय को नेता प्रतिपक्ष बनाना और शहरों में भगवान परशुराम की मूर्तियां लगवाना इस बात का प्रमाण है कि सपा अब अपनी ‘एम-वाई’ (मुस्लिम-यादव) छवि को बदलकर सर्वसमाज, खासकर ब्राह्मणों को जोड़ना चाहती है।
जातिवाद की प्रयोगशाला कहे जाने वाले बिहार में भी ब्राह्मणों को लेकर सियासी तापमान हाई है। हाल ही में बिहार विधानसभा में सीपीआईएमएल विधायक संदीप सौरभ द्वारा ब्राह्मणवादी मानसिकता शब्द के इस्तेमाल पर भारी बवाल हुआ। स्पीकर ने इस शब्द को कार्यवाही से हटाने का निर्देश दिया, तो सदन हंगामे की भेंट चढ़ गया। डिप्टी सीएम विजय सिन्हा ने अपनी आपबीती सुनाते हुए भावुक होकर कहा कि कैसे उन्हें ‘भूमिहार ब्राह्मण’ होने की वजह से कॉलेज के दिनों में प्रताड़ित किया गया था। बिहार की करीब 40 सीटों पर ब्राह्मणों का सीधा प्रभाव है। भले ही जातीय गणना में इनकी आबादी 3.66% दिखाई गई हो, लेकिन ‘ओपिनियन मेकर’ और ‘ट्रेंड सेटर’ होने के नाते कोई भी दल इनसे बैर मोल नहीं लेना चाहता।
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ब्राह्मणों को राजनीति में ‘साइलेंट वोटर’ माना जाता है। वे जिस तरफ झुकते हैं, समाज के अन्य वर्गों में भी एक बड़ा संदेश जाता है। आजादी के बाद दशकों तक कांग्रेस का आधार रहे इस वोट बैंक पर फिलहाल भाजपा का मजबूत कब्जा है, लेकिन अब क्षेत्रीय दल इस ‘लॉयल’ वर्ग में सेंधमारी के लिए बेताब हैं। साफ है कि 2027 के यूपी चुनाव हों या बिहार की राजनीति, ब्राह्मणों के सम्मान और भागीदारी के बिना दिल्ली का रास्ता तय करना मुश्किल है।