वक्फ संपत्ति विवाद में हाईकोर्ट ने नहीं लगाई रोक, कहा- विवादित मुद्दे समान हों तभी लागू होगी CPC की धारा 10

High Court Latest Judgment: हाईकोर्ट ने वक्फ संपत्ति से जुड़े किरायेदार की बेदखली और किराया वसूली के मुकदमे में ट्रायल कोर्ट की कार्यवाही पर रोक से इनकार किया। आगे पढ़िए हाईकोर्ट ने और क्या कहा?
Allahabad High Court Refuses to Stay Eviction and Rent Recovery Case Over Waqf Property
हाईकोर्ट(सोर्स- सोशल मीडिया)
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Allahabad High Court Waqf Property Case: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने वक्फ संपत्ति से जुड़े किरायेदार की बेदखली और किराया वसूली के मुकदमे में ट्रायल कोर्ट की कार्यवाही पर रोक लगाने से इनकार कर दिया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि केवल इस आधार पर कि किसी अन्य मुकदमे में कुछ समान मुद्दे लंबित हैं, सिविल प्रक्रिया संहिता (सीपीसी) की धारा 10 के तहत कार्यवाही पर रोक नहीं लगाई जा सकती। दोनों मुकदमों में विवाद का विषय सीधे और सार रूप से समान होना जरूरी है।

बेदखली और किराया वसूली का मामला

न्यायमूर्ति डॉ. योगेंद्र कुमार श्रीवास्तव की एकलपीठ ने मुरादाबाद निवासी रईसी बेगम व दो अन्य की याचिका खारिज करते हुए यह आदेश दिया। याचिका में अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश के 9 अक्टूबर 2025 और 7 मार्च 2026 के अंतरिम आदेशों को चुनौती दी गई थी। याचिकाकर्ताओं ने एक ओर अतिरिक्त मुद्दे तय करने की मांग की थी, वहीं दूसरी ओर हाईकोर्ट में लंबित द्वितीय अपील के निस्तारण तक ट्रायल कोर्ट की कार्यवाही रोकने का आग्रह किया था।

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1992 के बैनामे और 2007 से किराया न देने का दावा

विवादित संपत्ति के संबंध में वादियों का कहना है कि उन्होंने 3 और 7 जनवरी 1992 को तत्कालीन मुतवल्ली शमशुल हसन से बैनामा कराया था। रईसी बेगम और अन्य किरायेदार के रूप में संपत्ति में रह रहे थे तथा अप्रैल 2007 से 2000 रुपये मासिक किराया नहीं दे रहे थे। रईसी बेगम पक्ष का दावा है कि विवादित संपत्ति वक्फ की है और इसका फैसला वक्फ ट्रिब्यूनल को करना चाहिए। ट्रायल कोर्ट ने 21 मई 2019 को मुकदमे में सात मुद्दे तय किए थे।

दोनों मुकदमों का विषय अलग, इसलिए रोक का आधार नहीं

हाईकोर्ट ने कहा कि अतिरिक्त मुद्दे तय करना अधीनस्थ न्यायालय के विवेक का विषय है। मौजूदा मुकदमे का संबंध बेदखली और किराया वसूली से है, जबकि इलाहाबाद हाईकोर्ट में लंबित द्वितीय अपील 1992 में हुए बैनामों की वैधता से संबंधित है। इसलिए दोनों मुकदमों का विवाद सीधे और सार रूप में एक जैसा नहीं है। ऐसे में सीपीसी की धारा 10 के तहत ट्रायल कोर्ट की कार्यवाही रोकने का कोई आधार नहीं बनता।

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