

Allahabad High Court Decision On Public Property: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने सार्वजनिक संपत्तियों पर अवैध कब्जों से जुड़े मामलों में अहम टिप्पणी करते हुए स्पष्ट किया है कि केवल लंबे समय तक कब्जा बनाए रखने से किसी व्यक्ति को संपत्ति पर कानूनी अधिकार प्राप्त नहीं हो जाता। अदालत ने कहा कि सार्वजनिक भूमि पर स्वामित्व या वैध अधिकार साबित करने के लिए ठोस दस्तावेजी साक्ष्य आवश्यक हैं।
न्यायमूर्ति जेजे मुनीर और न्यायमूर्ति अरुण कुमार की खंडपीठ ने अलीगढ़ नगर निगम की ओर से जारी बेदखली नोटिस को चुनौती देने वाली याचिका खारिज कर दी। अदालत ने नगर निगम की कार्रवाई को विधिसम्मत मानते हुए याचिकाकर्ताओं को राहत देने से इनकार कर दिया।
मामला अलीगढ़ के मौजा दादूपुर माफी स्थित प्लॉट संख्या 78 और 87 पर बने आवासीय क्वार्टरों से जुड़ा था। याचिकाकर्ताओं का दावा था कि वे नगर निगम के किरायेदार हैं और नियमित रूप से प्रीमियम शुल्क भी जमा करते रहे हैं, इसलिए उन्हें बेदखल नहीं किया जा सकता। हालांकि सुनवाई के दौरान वे अपने दावे के समर्थन में कोई आवंटन पत्र, पट्टा, किरायानामा या अन्य वैध दस्तावेज प्रस्तुत नहीं कर सके।
हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि संबंधित भूखंडों का फ्री होल्ड अधिकार राज्य सरकार ने 26 सितंबर 2009 को नगर निगम के पक्ष में कर दिया था। ऐसे में उससे पहले फ्रीहोल्ड अधिकार का दावा टिक नहीं सकता। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि नगर आयुक्त के आदेश में कोई कानूनी या प्रक्रियागत त्रुटि नहीं है और नगर निगम कानून के अनुसार आगे की कार्रवाई करने के लिए स्वतंत्र है।
यह फैसला सार्वजनिक संपत्तियों पर लंबे समय से काबिज लोगों के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है। अदालत ने अपने आदेश में दोहराया कि लंबे समय तक कब्जा बनाए रखना स्वामित्व का आधार नहीं बन सकता, बल्कि वैध अधिकार के लिए कानूनी दस्तावेज और विधिक प्रक्रिया का पालन आवश्यक है।