

Allahabad High Court Judgment On Maternity Leave: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने मातृत्व अवकाश को लेकर महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि यदि किसी सरकारी महिला कर्मचारी की दो या दो से अधिक जीवित संतानें हैं, तो वह तीसरी या चौथी संतान के जन्म के लिए मातृत्व अवकाश की पात्र नहीं होगी। कोर्ट ने कहा कि यह नियम उस स्थिति में भी लागू होगा, जब कर्मचारी किसी विशेष प्रसव के लिए पहली बार मातृत्व अवकाश की मांग कर रही हो।
यह आदेश न्यायमूर्ति जेजे मुनीर और न्यायमूर्ति इंदजीत शुक्ल की खंडपीठ ने सोनभद्र की डीएम-एसपीओ तथा विशेष भूमि अधिग्रहण अधिकारी (एसएलएओ) के खिलाफ दायर अवमानना याचिका पर सुनवाई करते हुए दिया।
मामला वर्ष 2014 से लंबित याचिका में राज्य सरकार की ओर से जवाबी हलफनामा दाखिल न किए जाने से जुड़ा था। हाईकोर्ट ने दो बार आदेश देने के बावजूद जवाबी हलफनामा दाखिल नहीं होने पर संबंधित अधिकारियों को व्यक्तिगत रूप से तलब किया। कोर्ट ने दोनों अधिकारियों को 12 अगस्त की दोपहर दो बजे अदालत में उपस्थित होकर जवाब देने का आदेश दिया है।
अदालत ने कहा कि 2014 में नोटिस जारी होने के बाद राज्य सरकार को जवाबी हलफनामा दाखिल करने के लिए पर्याप्त समय दिया गया था। बावजूद इसके जवाब दाखिल नहीं किया गया। अक्टूबर 2021 में भी दो सप्ताह का अतिरिक्त समय दिया गया था। इसके बाद भी निर्धारित अवधि में जवाब दाखिल न होने पर प्रतिवादी संख्या चार और पांच को न्यायालय के समक्ष तलब करना पड़ा।
याचिकाकर्ता ने 19 जून 2026 के उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें उसके चौथे बच्चे के लिए मातृत्व अवकाश की मांग खारिज कर दी गई थी। याचिका में विभाग को छह महीने का मातृत्व अवकाश देने का निर्देश देने की मांग की गई थी। याचिकाकर्ता की ओर से दलील दी गई कि उसने पहले तीन बच्चों के जन्म पर कोई अवकाश नहीं लिया था, इसलिए चौथी संतान के लिए पहली बार मातृत्व अवकाश की मांग की जा रही है।
इस पर राज्य की ओर से अतिरिक्त मुख्य स्थायी अधिवक्ता ने कहा कि याचिकाकर्ता पहले ही मातृत्व अवकाश ले चुकी हैं। इसलिए उन्हें चौथी संतान के लिए फिर से यह लाभ नहीं दिया जा सकता।
हाईकोर्ट ने वित्त पुस्तिका के खंड-2, भाग-2 के अध्याय-10 के प्रावधानों का उल्लेख करते हुए कहा कि मातृत्व अवकाश प्रसव की तारीख से 180 दिनों तक स्वीकृत किया जा सकता है। हालांकि, यह अवकाश दोबारा तभी मिल सकता है, जब पिछले स्वीकृत अवकाश की समाप्ति के दो वर्ष बीत चुके हों।
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि किसी महिला सरकारी कर्मचारी की दो या उससे अधिक जीवित संतानें हैं, तो उसे मातृत्व अवकाश स्वीकृत नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने कहा कि गर्भपात के मामलों में अलग से छह सप्ताह के अवकाश का प्रावधान है, जिस पर वर्ष 1990 की अधिसूचना के जरिए पहले ही हाईकोर्ट के आदेश का उल्लेख किया जा चुका है।
कोर्ट ने याचिका के साथ लगाए गए दस्तावेजों की फोटो स्टेट प्रतियां होने पर भी आपत्ति जताई। अदालत के मुताबिक मूल दस्तावेजों की जगह केवल टाइप की गई प्रतियां लगाई गई थीं, जिनमें टाइपिंग की त्रुटियां भी पाई गईं। कोर्ट ने रजिस्ट्री सेक्शन को निर्देश दिया कि भविष्य में याचिकाओं के साथ उचित फोटोकॉपी प्रतियां ही संलग्न कराई जाएं।
हाईकोर्ट के इस फैसले से सरकारी महिला कर्मचारियों के मातृत्व अवकाश को लेकर लागू नियमों और उसकी सीमा को लेकर स्थिति और स्पष्ट हो गई है।