

Highlights:
सात साल बाद भी एम्स में कैथ लैब का इंतजार!
कार्यकारी निदेशक डॉ. विभा दत्ता निजी अस्पताल में भर्ती
पहले भी इमरजेंसी में स्ट्रेचर पर मरीज को 24 घंटे इंतजार कराने का मामला
AIIMS Gorakhpur Executive Director: पूर्वी उत्तर प्रदेश और बिहार के मरीजों को बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं उपलब्ध कराने के उद्देश्य से स्थापित अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) गोरखपुर एक बार फिर सवालों के घेरे में है। इस बार सवाल किसी आम मरीज की परेशानी को लेकर नहीं, बल्कि खुद एम्स की कार्यकारी निदेशक (ईडी) डॉ. विभा दत्ता के इलाज को लेकर उठ रहे हैं।
जानकारी के मुताबिक, डॉ. विभा दत्ता अपने आवास पर अचानक बेहोश हो गईं। इसके बाद उन्हें तत्काल एम्स की इमरजेंसी में भर्ती कराया गया, जहां डॉक्टरों ने उनका उपचार शुरू किया। हालांकि, कुछ समय बाद उन्हें एम्बुलेंस के माध्यम से गोरखपुर के एक निजी अस्पताल में शिफ्ट कर दिया गया। फिलहाल उनकी तबीयत स्थिर बताई जा रही है और वह अपने नियमित कार्यों में लौट आई हैं।
इस पूरे घटनाक्रम ने गोरखपुर एम्स की चिकित्सा सुविधाओं और संसाधनों को लेकर एक नई बहस छेड़ दी है। सवाल यह है कि जिस संस्थान पर पूर्वांचल और बिहार के लाखों लोगों को बेहतर इलाज उपलब्ध कराने की जिम्मेदारी है, उसी संस्थान की मुखिया को उपचार के लिए निजी अस्पताल क्यों जाना पड़ा?
हालांकि, डॉ. विभा दत्ता को निजी अस्पताल में स्थानांतरित करने के पीछे की चिकित्सकीय वजह और उपचार से जुड़ी विस्तृत जानकारी आधिकारिक तौर पर स्पष्ट होना बाकी है, लेकिन इस घटनाक्रम ने एम्स की व्यवस्थाओं पर सवाल जरूर खड़े कर दिए हैं।
गोरखपुर एम्स की स्थापना के लगभग सात साल बीत चुके हैं। इस दौरान संस्थान ने चिकित्सा सुविधाओं के विस्तार और बेहतर इलाज के कई दावे किए हैं, लेकिन कैथ लैब जैसी महत्वपूर्ण सुविधा का इंतजार अब भी चर्चा का विषय बना हुआ है। कैथ लैब की मदद से हृदय रोग से जुड़ी कई गंभीर जांच और प्रक्रियाएं की जाती हैं।
ऐसे में सवाल उठता है कि पूर्वांचल के इतने बड़े चिकित्सा संस्थान में हृदय रोगियों के लिए जरूरी सुविधाओं का विस्तार आखिर कब तक पूरा होगा? हालांकि, यह स्पष्ट नहीं है कि डॉ. विभा दत्ता को निजी अस्पताल भेजने का कारण कैथ लैब की अनुपलब्धता ही थी।
गोरखपुर एम्स में मरीजों की परेशानियों को लेकर यह पहला मामला नहीं है। कुछ दिन पहले गोरखपुर की सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर श्वेता राय के भाई के सड़क हादसे में घायल होने के बाद इलाज को लेकर भी सवाल उठे थे।
आरोप था कि घायल युवक को एम्स की इमरजेंसी में करीब 24 घंटे तक स्ट्रेचर पर रहना पड़ा और उसे अपेक्षित चिकित्सा सुविधाएं नहीं मिल सकीं। बाद में परिजन उसे इलाज के लिए लखनऊ लेकर गए, जहां उसकी मौत हो गई। इस घटना ने भी एम्स की इमरजेंसी व्यवस्था और मरीजों को मिलने वाली सुविधाओं पर सवाल खड़े किए थे।
गोरखपुर एम्स केवल गोरखपुर ही नहीं, बल्कि देवरिया, कुशीनगर, महराजगंज, बस्ती, सिद्धार्थनगर समेत बिहार के सीमावर्ती जिलों के मरीजों के लिए भी एक बड़ी उम्मीद है। गंभीर बीमारियों के इलाज के लिए लोगों को बड़े शहरों की दौड़ न लगानी पड़े, इसी सोच के साथ इस संस्थान की स्थापना की गई थी।
लेकिन जब इसी संस्थान की इमरजेंसी व्यवस्था, जरूरी चिकित्सा संसाधनों और मरीजों को मिलने वाली सुविधाओं पर बार-बार सवाल उठने लगें तो जवाबदेही भी तय होनी चाहिए। डॉ. विभा दत्ता के निजी अस्पताल में उपचार के लिए जाने का घटनाक्रम एक बार फिर इस बड़े संस्थान की व्यवस्थाओं की समीक्षा की जरूरत को सामने लाता है।
सवाल सिर्फ इतना नहीं है कि एम्स की ईडी को निजी अस्पताल क्यों जाना पड़ा, बल्कि यह भी है कि आम मरीजों को यहां कितनी बेहतर और भरोसेमंद स्वास्थ्य सुविधाएं मिल पा रही हैं? और यदि सात साल बाद भी अगर जरूरी चिकित्सा सुविधाओं का इंतजार बना हुआ है, तो पूर्वांचल के मरीजों को बेहतर इलाज का भरोसा आखिर कब पूरी तरह जमीन पर उतरेगा?