

गंदे नाले जैसा पानी और दुर्गंध से ग्रामीण परेशान
गीडा की फैक्ट्रियों के अपशिष्ट और CETP की कार्यप्रणाली पर उठे सवाल
प्रदूषण पर लगाम लगाने और नदी को पुनर्जीवित करने की चुनौती बरकरार
Pollution Threatens Aami River: कभी गोरखपुर के दक्षिणांचल की जीवनरेखा कही जाने वाली आमी नदी आज अपनी बदहाली पर आंसू बहा रही है। जिस नदी का पानी कभी स्नान, ध्यान और आचमन के योग्य माना जाता था, आज उसकी दुर्दशा देखकर सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है कि प्रकृति के इस अनमोल उपहार के साथ हमने कैसा व्यवहार किया है।
नदी का पानी गंदे नाले जैसा दिखाई देने की शिकायतें लंबे समय से उठती रही हैं। कभी लोगों की आस्था और जीवन से जुड़ी रही आमी आज प्रदूषण के गंभीर संकट से जूझ रही है। नदी को बचाने के लिए आवाजें उठीं, आंदोलन हुए और इसके संरक्षण की मांग की गई, लेकिन सवाल अब भी कायम है कि आखिर आमी नदी को प्रदूषण से मुक्ति कब मिलेगी?
नदी की मौजूदा स्थिति और उसके पुराने स्वरूप के बीच का अंतर समझने के लिए इसके किनारे बसे गांवों के लोगों की पीड़ा सुनना जरूरी है। कटका गांव के 75 वर्ष से अधिक उम्र के निवासी रामप्रवेश के लिए आमी नदी केवल पानी की धारा नहीं, बल्कि बीते समय की यादों से जुड़ी हुई है।
उन्होंने अपने जीवनकाल में नदी के स्वरूप को बदलते देखा है। उनके मुताबिक, कभी जिस नदी का पानी गांव के लोगों के रोजमर्रा के जीवन का हिस्सा हुआ करता था, आज उसी के किनारे खड़ा होना भी मुश्किल हो गया है।
रामप्रवेश बताते हैं कि एक समय था जब आमी नदी का पानी स्वच्छ हुआ करता था। गांव के लोग इस पानी का इस्तेमाल पीने और भोजन बनाने तक के लिए करते थे। नदी का पानी उनके जीवन की जरूरतों को पूरा करता था और आसपास के लोगों के लिए यह किसी प्राकृतिक संपदा से कम नहीं थी। लेकिन समय के साथ नदी की स्थिति ऐसी बिगड़ी कि अब इसका पानी किसी उपयोग में लाने की बात तो दूर, इसके किनारे बिना नाक बंद किए खड़ा होना भी मुश्किल हो गया है।
उनके मुताबिक, नदी के पानी से उठने वाली सड़ांध की बदबू आसपास के गांवों तक फैलती है, जिससे स्थानीय लोगों को काफी परेशानी का सामना करना पड़ता है। जिस नदी के किनारे कभी लोग सहजता से समय बिताते थे, आज उसी के आसपास रहने वाले लोगों को दुर्गंध झेलनी पड़ रही है। रामप्रवेश की बातें आमी नदी में आए बदलाव की एक ऐसी तस्वीर पेश करती हैं, जिसे केवल सरकारी आंकड़ों से नहीं समझा जा सकता। यह उस पीढ़ी का अनुभव है, जिसने नदी को स्वच्छ भी देखा और उसे धीरे-धीरे प्रदूषण की चपेट में आते हुए भी महसूस किया।
नदी के किनारे बसे लोगों के लिए यह समस्या केवल पर्यावरण तक सीमित नहीं है, बल्कि उनके रोजमर्रा के जीवन और आसपास के वातावरण से भी जुड़ी हुई है। रामप्रवेश जैसे बुजुर्गों की यादों में सुरक्षित आमी नदी का पुराना स्वरूप अब मौजूदा हालात से मेल नहीं खाता।
ऐसे में सवाल उठता है कि जिस नदी का पानी कभी लोगों के घरेलू इस्तेमाल में आता था, उसकी स्थिति इतनी खराब कैसे हो गई? नदी को प्रदूषित करने के लिए जिम्मेदार स्रोतों पर नियंत्रण क्यों नहीं हुआ और नदी को पुनर्जीवित करने के प्रयास कहां तक पहुंचे हैं? प्रदूषण पर रोक और नदी पुनर्जीवन के प्रयास कितने सफल रहे?
आमी नदी की बदहाली के बीच गोरखपुर औद्योगिक विकास प्राधिकरण (गीडा) क्षेत्र की औद्योगिक इकाइयों से निकलने वाले अपशिष्ट का मामला महत्वपूर्ण हो जाता है। औद्योगिक विकास किसी भी क्षेत्र की अर्थव्यवस्था को गति देता है, रोजगार के अवसर पैदा करता है और विकास की नई संभावनाएं खोलता है। लेकिन विकास की यह रफ्तार पर्यावरण की कीमत पर नहीं होनी चाहिए।
गीडा की फैक्ट्रियों से निकलने वाले दूषित पानी के निस्तारण और उसके आमी नदी तक पहुंचने को लेकर उठते सवालों ने औद्योगिक प्रदूषण पर गंभीर पड़ताल की जरूरत पैदा कर दी है। हालांकि, प्रदूषण के स्रोतों और उनकी भूमिका को लेकर किसी निष्कर्ष पर पहुंचने के लिए संबंधित औद्योगिक इकाइयों के अपशिष्ट, शोधन व्यवस्था और नदी के पानी की जांच रिपोर्ट का अध्ययन जरूरी है।
अगर फैक्ट्रियों से निकलने वाला अपशिष्ट बिना समुचित शोधन के नदी में प्रवेश करता है, तो इसका असर केवल पानी की गुणवत्ता तक सीमित नहीं रहता। इससे जलीय जीवों, नदी के पारिस्थितिकी तंत्र और आसपास के पर्यावरण पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है। ऐसे में यह जानना जरूरी है कि औद्योगिक इकाइयों से निकलने वाले पानी का कितना प्रभावी शोधन हो रहा है और प्रदूषण नियंत्रण के नियमों का पालन सुनिश्चित करने के लिए जिम्मेदार विभाग क्या कदम उठा रहे हैं।
गीडा की औद्योगिक इकाइयों से निकलने वाले अपशिष्ट के शोधन के लिए कॉमन एफ्लुएंट ट्रीटमेंट प्लांट (CETP) की व्यवस्था अहम है। लेकिन केवल प्लांट की स्थापना या उसके संचालन का दावा कर देना पर्याप्त नहीं है। असली सवाल यह है कि इसकी वर्तमान स्थिति क्या है, यह कितनी क्षमता से काम कर रहा है और शोधन के बाद निकलने वाला पानी निर्धारित पर्यावरणीय मानकों पर खरा उतरता है या नहीं।
आमी नदी में प्रदूषण की वास्तविक स्थिति समझने के लिए CETP की संचालन रिपोर्ट, औद्योगिक इकाइयों के निरीक्षण संबंधी दस्तावेज और नदी के पानी की नवीनतम जांच रिपोर्ट सामने आनी चाहिए। उत्तर प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड और गीडा प्रशासन को यह स्पष्ट करना चाहिए कि नदी में प्रदूषण रोकने के लिए अब तक क्या कदम उठाए गए हैं। यदि कहीं नियमों का उल्लंघन हो रहा है, तो उसके विरुद्ध क्या कार्रवाई की गई है? इन सवालों के जवाब ही प्रदूषण नियंत्रण के दावों और जमीनी हकीकत के बीच की दूरी को स्पष्ट कर सकते हैं।
आमी नदी को प्रदूषण मुक्त कराने के उद्देश्य से समय-समय पर आंदोलन होते रहते हैं। नदी के संरक्षण और इसे प्रदूषण से बचाने के लिए जिम्मेदारों का ध्यान आकर्षित करने की कोशिशें की गईं। इसके बावजूद नदी की मौजूदा स्थिति को लेकर चिंता बनी हुई है।
कटका गांव के रामप्रवेश की बातें इस चिंता को और गंभीर बनाती हैं। एक बुजुर्ग की यादों में दर्ज स्वच्छ नदी और आज उसके किनारे फैली दुर्गंध के बीच का अंतर बताता है कि समस्या कितनी गहरी है। सवाल यह है कि नदी को बचाने के लिए हुए आंदोलनों के बाद क्या ठोस बदलाव हुए? क्या प्रदूषण के स्रोतों पर प्रभावी नियंत्रण स्थापित हो पाया? क्या नदी की सफाई और जल गुणवत्ता में सुधार के लिए बनाई गई योजनाओं का अपेक्षित परिणाम सामने आया?
इन सवालों का जवाब केवल आश्वासनों से नहीं, बल्कि ठोस आंकड़ों और जमीनी पड़ताल से मिलना चाहिए। राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) में आमी नदी के प्रदूषण से संबंधित मामलों, जारी निर्देशों और उनके अनुपालन की स्थिति की भी जांच जरूरी है, ताकि पता चल सके कि नदी को बचाने के प्रयास किस चरण में हैं।
आमी नदी की बदहाली केवल एक जलधारा के प्रदूषित होने का मामला नहीं है। यह पर्यावरण संरक्षण, औद्योगिक जिम्मेदारी और प्रशासनिक जवाबदेही से जुड़ा सवाल है। उद्योगों का विकास जरूरी है, लेकिन नदियों को प्रदूषित होने से बचाना भी उतना ही महत्वपूर्ण है। इसके लिए औद्योगिक अपशिष्ट का समुचित शोधन, नियमित निगरानी, नियमों का उल्लंघन करने वालों पर कार्रवाई और नदी के पानी की गुणवत्ता की निरंतर जांच आवश्यक है।
कटका गांव के रामप्रवेश की यादें आमी नदी के बदलते स्वरूप की गवाही देती हैं। कभी जिस पानी का इस्तेमाल लोग पीने और भोजन बनाने के लिए करते थे, आज उसी नदी के किनारे उठने वाली दुर्गंध स्थानीय लोगों के लिए परेशानी का कारण बनी हुई है। यह बदलाव केवल एक बुजुर्ग की स्मृतियों तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि संबंधित विभागों के लिए नदी की वास्तविक स्थिति की जांच करने और ठोस कदम उठाने का आधार बनना चाहिए।
आमी नदी को बचाने के लिए अब सवालों से आगे बढ़कर कार्रवाई की जरूरत है। नदी को स्वच्छ बनाने की दिशा में किए गए प्रयासों का आकलन उसके पानी की गुणवत्ता में आए बदलाव से होना चाहिए, न कि केवल योजनाओं और घोषणाओं से।
जिस आमी नदी को रामप्रवेश ने कभी स्वच्छ देखा था, क्या आने वाली पीढ़ियां भी उसका वैसा स्वरूप देख पाएंगी? क्या नदी का पानी फिर से स्वच्छ हो सकेगा और क्या उसके किनारे बसे लोगों को दुर्गंध से मुक्ति मिलेगी? वर्षों से प्रदूषण का दंश झेल रही आमी के भविष्य का फैसला इन सवालों के जवाब और जिम्मेदार विभागों की कार्रवाई से ही होगा।
रिपोर्ट:- अनुराग मिश्रा