

Agra Eco friendly Ganesh Idols: गणेश चतुर्थी आने में भले ही अभी समय हो, लेकिन ताजनगरी के बाजारों में भगवान गणेश की प्रतिमाओं की मांग को लेकर तैयारियां शुरू हो गई हैं। इस बार खास बात यह है कि आधुनिक दौर में जहां प्लास्टर ऑफ पेरिस की प्रतिमाएं बाजार में आसानी से उपलब्ध हैं, वहीं आगरा में करीब पांच दशक से कोलकाता की पारंपरिक मूर्तिकला मिट्टी और प्राकृतिक सामग्री के सहारे अपनी अलग पहचान बनाए हुए है।
नामनेर स्थित राधा कृष्ण मंदिर परिसर में कोलकाता से आए मूर्तिकार परिवार की कार्यशाला इन दिनों आस्था और कला का अनूठा संगम बनी हुई है। करीब 50 वर्ष पहले कोलकाता से आगरा आए इस परिवार की कई पीढ़ियां भगवान गणेश, मां दुर्गा और अन्य देवी-देवताओं की प्रतिमाएं तैयार करने में जुटी हैं। उनके हाथों से तैयार प्रतिमाओं को देखकर ऐसा लगता है, जैसे मिट्टी में प्राण भरकर भगवान स्वयं धरती पर उतर आए हों।
मूर्तिकारों के मुताबिक उनकी प्रतिमाओं में मिट्टी के साथ चावल के भूसे का प्रयोग किया जाता है। प्रतिमाओं को आकर्षक रूप देने के लिए इस्तेमाल होने वाले रंग भी पर्यावरण अनुकूल होते हैं। उनका दावा है कि विसर्जन के दौरान ये रंग पानी में घुल जाते हैं, जिससे पर्यावरण पर अपेक्षाकृत कम प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।
मूर्तिकारों ने बताया कि गणेश चतुर्थी को लेकर इस बार भी काम शुरू हो चुका है। आगरा के अलावा आसपास के जिलों और दूसरे शहरों से भी प्रतिमाओं के ऑर्डर मिल रहे हैं। जरूरत के मुताबिक छोटी से लेकर करीब 30 फीट तक ऊंची प्रतिमाएं तैयार की जाती हैं।
इन प्रतिमाओं की सबसे खास बात उनका स्वरूप और बारीक कारीगरी है। कहीं भगवान गणेश को स्वर्णाभूषणों से सुसज्जित किया गया है तो कहीं उन्हें भगवान श्रीकृष्ण के स्वरूप में सजाया गया है। कुछ प्रतिमाओं में गणपति अपनी मां पार्वती और पिता भगवान शिव की गोद में विराजमान नजर आते हैं।
प्रतिमाओं की आंखों, आभूषणों, मुकुट और चेहरे के भावों पर की गई बारीक कारीगरी उन्हें जीवंत बना देती है। यही वजह है कि कार्यशाला में तैयार होने वाली प्रतिमाएं केवल पूजा की सामग्री नहीं, बल्कि कला और आस्था का अद्भुत उदाहरण बन जाती हैं।
मूर्तिकार बताते हैं कि करीब 15-20 वर्ष पहले आगरा में गणेश चतुर्थी पर प्रतिमाओं की मांग आज की तुलना में काफी कम थी। लेकिन पिछले एक से डेढ़ दशक में गणेश चतुर्थी के आयोजन और सार्वजनिक पूजा का चलन तेजी से बढ़ा है। शहर के अलग-अलग हिस्सों में बड़े स्तर पर गणपति स्थापना होने लगी है और श्रद्धालुओं की संख्या भी लगातार बढ़ी है।
मूर्तिकारों के अनुसार, आस्था के इस बढ़ते दायरे ने मूर्तिकारों के लिए भी नए अवसर पैदा किए हैं। अब श्रद्धालु केवल प्रतिमा खरीदना नहीं चाहते, बल्कि ऐसी प्रतिमा की तलाश करते हैं जिसमें भगवान के स्वरूप के साथ कलाकार की कल्पना और पारंपरिक कला की झलक भी दिखाई दे।
आगरा में पांच दशक से जारी कोलकाता के इस परिवार का हुनर इसी परंपरा को आगे बढ़ा रहा है। मिट्टी, भूसे, प्राकृतिक रंग और हाथों की बारीक कारीगरी से तैयार होती ये प्रतिमाएं यह संदेश भी देती हैं कि आस्था और पर्यावरण संरक्षण साथ-साथ चल सकते हैं।