300 साल पुरानी सोने-चांदी की ताजिया बनेगी आकर्षण का केंद्र, मोहर्रम पर गोरखपुर में होंगे दीदार

Gorakhpur Taziya: मियां साहब इमामबाड़े में सुरक्षित 300 साल पुरानी सोने-चांदी की ताजिया मोहर्रम पर लोगों के दीदार के लिए प्रदर्शित की जाएगी। यह ऐतिहासिक धरोहर सामाजिक सौहार्द का प्रतीक मानी जाती है।
300-Year-Old Gold and Silver Tazia to Draw Devotees During Muharram in Gorakhpur
ताजिया (सोर्स- फोटो नवभारत)
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Gorakhpur Taziya Muharram 2026: मोहर्रम के पवित्र महीने में गोरखपुर का ऐतिहासिक मियां साहब इमामबाड़ा एक बार फिर श्रद्धालुओं और अकीदतमंदों के आकर्षण का केंद्र बनने जा रहा है। यहां सुरक्षित रखी गई करीब 300 वर्ष पुरानी सोने और चांदी की ताजिया मोहर्रम से दस दिन पहले आम लोगों के दीदार के लिए बाहर निकाली जाती है। इस दौरान विभिन्न धर्मों के लोग बड़ी संख्या में पहुंचकर ताजिया का दर्शन करते हैं और गंगा-जमुनी तहजीब की मिसाल पेश करते हैं।

300 वर्षों का गौरवशाली इतिहास

मियां बाजार स्थित मियां साहब इमामबाड़े में रखी यह ताजिया अपने ऐतिहासिक, धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व के लिए देश-दुनिया में जानी जाती है। मान्यता है कि इमामबाड़े की नींव सूफी संत हजरत सैयद रोशन अली शाह ने वर्ष 1717 में रखी थी। उनकी आध्यात्मिक ख्याति से प्रभावित होकर अवध के नवाब आसिफुद्दौला की बेगम ने यह अनमोल सोने-चांदी की ताजिया उन्हें भेंट स्वरूप प्रदान की थी।

मुगलकालीन कला का अद्भुत नमूना

आदमकद आकार की इस ताजिया पर की गई बारीक नक्काशी इसे विशेष बनाती है। इसमें फारसी, तुर्की और भारतीय शिल्प कला का सुंदर संगम दिखाई देता है। विशेषज्ञ इसे मुगलकालीन वास्तुकला और शिल्पकला का उत्कृष्ट उदाहरण मानते हैं। यही कारण है कि यह ताजिया केवल धार्मिक धरोहर ही नहीं, बल्कि सांस्कृतिक और ऐतिहासिक विरासत के रूप में भी महत्वपूर्ण स्थान रखती है।

सालभर रहती है विशेष सुरक्षा में

ताजिया को पूरे वर्ष इमामबाड़े के एक विशेष कक्ष में सुरक्षित रखा जाता है। मोहर्रम के अवसर पर इसे बाहर प्रदर्शित करने से पहले विशेषज्ञ कारीगरों द्वारा इसकी साफ-सफाई और संरक्षण का कार्य किया जाता है। इसके बाद श्रद्धालुओं के दर्शन के लिए इसे रखा जाता है। इस दौरान सुरक्षा के व्यापक इंतजाम किए जाते हैं और बड़ी संख्या में सुरक्षाकर्मियों की तैनाती की जाती है।

सौहार्द और भाईचारे की पहचान

गोरखपुर की यह ऐतिहासिक ताजिया धार्मिक आस्था के साथ-साथ हिंदू-मुस्लिम एकता और सामाजिक सौहार्द का भी प्रतीक मानी जाती है। मोहर्रम के दौरान यहां सभी समुदायों के लोग पहुंचकर ताजिया का दीदार करते हैं और आपसी भाईचारे का संदेश देते हैं।

क्या बोले मियां साहब

मियां साहब अयान अली शाह ने बताया कि, "यह ताजिया हमारे बुजुर्गों की अमानत है। करीब 300 वर्षों से इसकी परंपरा चली आ रही है। मोहर्रम के दौरान सभी धर्मों के लोग यहां आते हैं और ताजिया का दीदार करते हैं। यह आपसी भाईचारे और सौहार्द का प्रतीक है।"

गोरखपुर की साझा संस्कृति की पहचान

हर वर्ष मोहर्रम के अवसर पर मियां साहब इमामबाड़े में उमड़ने वाली भीड़ इस बात का प्रमाण है कि यह ताजिया केवल एक धार्मिक प्रतीक नहीं, बल्कि गोरखपुर की साझा सांस्कृतिक विरासत और गंगा-जमुनी तहजीब की जीवंत पहचान भी है। तीन सदियों से चली आ रही यह परंपरा आज भी लोगों को एकता, प्रेम और भाईचारे का संदेश दे रही है।

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