Mahakumbh 2025: परम-धर्म संसद में योगी पर बरसे शंकराचार्य, धार्मिक न्यायालय के गठन का किया ऐलान
महाकुंभ 2025 इस बार कई इतिहास बनाएगा। एक तरफ धर्म संसद चल रही है, जिसमें सनातन बोर्ड के गठन का ऐलान होगा। धर्म संसद कथा वाचक देवकी नंदन ठाकुर ने बुलाई है। वहीं दूसरी तरफ शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद ने धर्म न्यायालय...
- Written By: Saurabh Pal
शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद और सीएम योगी (फोटो- सोशल मीडिाय
प्रयागराजः महाकुंभ 2025 इस बार कई इतिहास बनाएगा। एक तरफ धर्म संसद चल रही है, जिसमें सनातन बोर्ड के गठन का ऐलान होगा। धर्म संसद कथा वाचक देवकी नंदन ठाकुर ने बुलाई है। वहीं दूसरी तरफ शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद ने धर्म न्यायालय का गठन किया है। इसमें सभी धार्मिक मामलों का निपटारा किया जाएगा। यदि भविष्य में ऐसा संभव हुआ सरकार ने धर्म न्यायालय को मान्यता दी तो इसके इतिहास के पहले पन्ने पर प्रयागराज का महाकुंभ होगा।
शंकराचार्य ने परम धर्म संसद में बोलते हुए कहा कि “कोई समय था जब हमारे देश में न राज्य था, न राजा। न दण्ड था न दाण्डिक न्यायाधीश। धर्म सबके जीवन में था, जिससे सारे समाज की परस्पर रक्षा हो जाती थी। समय बदला तो दुष्ट बलवानों ने निर्बलों को सताना शुरू किया। ऐसे में न्यायालयों की आवश्यकता पड़ी, राजा की आवश्यकता हुई।
इससे जनता को तात्कालिक रूप से लाभ हुआ पर धीरे-धीरे उसमें भी संवेदनशीलता की कमी आने लगी और आज वह न्याय कम और प्रोसीजर ज्यादा हो गया है। ऐसा हम नहीं उच्चतम न्यायालय के किसी न्यायाधीश ने ही कहा है।”
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योगी आदित्यनाथ पर बरसे शंकराचार्य
इस दौरान उन्होंने गो हत्या व गोमांस बिक्री पर भाजपा सरकार से नाराजगी जताई। अविमुक्तेश्वरा नंद ने कहा कि हिंदुओं का वोट लेकर हिंदुओं के साथ धोखा हुआ है। जब उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ महंत तब गोमांस का सबसे अधिक निर्यात हो रहा है। इसके अलावा गोमांस की वकालत करने वालों को लताड़ लगाते हुए शंकराचार्य ने कहा कि जो कहते हैं कि गोमांस खाना हमारा अधिकार है। उन्हें शरिया कानून वाले देश चले जाना चाहिए।
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‘धर्म के आवश्यक तत्व तय न करें न्यायालय’
धर्म न्यायालय को लेकर उन्होंने कहा कि देश में समय-समय पर अलग-अलग संदर्भों में विधि विशेषज्ञों ने बताया है कि संविधान की धारा 14 धारा 25 के ऊपर अधिमान नहीं पानी चाहिए। अदालतों को यह तय नहीं करना चाहिए कि धर्म के आवश्यक तत्व क्या हैं? इसेक आगे उन्होंने कहा कि न्यायलयों को धर्मिक अभ्यासों व परंपराओं में हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए। यदि परंपराओं और धार्मिक अभ्यासों से किसी का शोषण या कोई बुराई हो रही है तो उस मामले में न्यायलय खुलकर फैसला ले। उन्होंने लाखों धार्मिक मामले में कोर्ट में लंबित है। जबकि संविधान की धारा 26 बी के अनुसार धार्मिक क्रियाओं के सम्पादन के अधिकार में अदालतों को हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए।
कोर्ट को उपल्बध कराएगा धार्मिक विशेषज्ञ
धार्मिक न्यायालय की घोषणा करते हुए शंकराचार्य ने कहा कि भारतीय न्यायालयों का भार कर करने के लिए धार्मिक न्यायालय का गठन किया जाता है। उन्होंने कहा कि जरूरत पर धार्मिक विशेषज्ञता उपलब्ध कराने और धार्मिक मामलों को धार्मिक गहराई के साथ निर्णीत कराने के उद्देश्य से व्यक्तिगत स्तर पर इस धार्मिक न्यायालय का गठन किया जाता है। इसके साथ उन्होंने अनुरोध किया कि परिवार न्यायालय की तर्ज पर धार्मिक न्यायालय गठन किया जाए।
