केशव की नहीं पाठक की योगी की कुर्सी पर नजर, CMO vs CMO की जंग पर अखिलेश का तंज
अखिलेश यादव ने डिप्टी सीएम ब्रजेश पाठक को आड़े हाथों लिया है। कानपुर के सीएमओ विवाद पर तंज कसते हुए कहा कि पाठक की नजर सीएम की कुर्सी पर अपने विभाग पर ध्यान नहीं है।
- Written By: Saurabh Pal
अखिलेश यादव और ब्रजेश पाठक (फोटो-सोशल मीडिया)
लखनऊः सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव अक्सर यूपी भाजपा की अंदरूनी कलह पर कटाक्ष करते रहते हैं, हर बार उनके निशाने पर केशव मौर्य रहते हैं। यूपी की राजनीति को जानने वाले अच्छी तरह से जानते हैं कि डिप्टी सीएम केशव प्रसाद मौर्य मुख्यमंत्री के प्रमुख दावेदारों में से एक थे, लेकिन अंत में योगी आदित्यनाथ की ताजपोशी हो गई। इस वजह से मुख्यमंत्री बनने का ख्वाब केशव मौर्य का अधूरा रह गया। हालांकि अखिलेश यादव ने अब चाल बदल दी है। सपा सुप्रीमो ने अब केशव को ब्रजेश पाठक से रिप्लेस कर दिया है।
कानपुर में छिड़े सीएमओ बनाम सीएमओ विवाद पर अखिलेश यादव ने डिप्टी सीएम व स्वास्थ्य मंत्री ब्रजेश पाठक को आड़े हाथों लिया। उन्होंने कहा कि उत्तर प्रदेश में स्वास्थ्य सेवाएं चरमरा गई हैं। सरकारी अस्पतालों में बदहाली व बदइंतजामी की वजह से मरीज निजी अस्पतालों में जाने को मजबूर हैं। उप मुख्यमंत्री की नज़र अपने विभाग के बजाय मुख्यमंत्री की कुर्सी पर होने की वजह से हर तरफ मनमानी और बदहाली दिखाई दे रही है। कानपुर में दो सीएमओ के बीच विवाद ऐसा हो रहा कि पुलिस बुलानी पड़ रही है।
बिना खून निकाले दे दी जांच रिपोर्ट
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इस दौरान जौनपुर के एक मामले पर तंज कसते हुए अखिलेश यादव ने डिप्टी सीएम को यूनिवर्स का सबसे बड़ा अवार्ड मिलना चाहिए। उनके नेतृत्व में ऐसी टेक्नालॉजी आ गई है कि बिना खून लिए जांच रिपोर्ट दे दी जा रही है। उन्होंने कहा कि उप मुख्यमंत्री साहब अपनी नाकामी छुपाने के लिए छापेबाजी करके बैठ जाते हैं। असर कुछ होता नहीं है। कहा कि पिछले दिनों डिप्टी साहब गोंडा के मेडिकल कॉलेज गए। वहां हर तरफ अव्यवस्था थी। अस्पताल में डॉक्टर जींस-टीशर्ट में थे। मरीजों ने बताया कि अस्पताल में भर्ती मरीजों को चादर भी नहीं मिलती है। मंत्री जी ने फटकार तो बहुत लगाई पर उनके 37 मिनट के दौरे के बाद कुछ भी नहीं बदला अस्पताल अपने ढर्रे पर आ गया।
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राजधानी में भी हालत खराबः अखिलेश
सपा अध्यक्ष ने कहा कि राजधानी लखनऊ में भी स्वास्थ्य सेवाओं की हालात खराब है। वेंटिलेटर होते हुए भी मरीजों की जाने जाती हैं। बेड होते हुए भी मरीज स्ट्रेचर पर इलाज कराते हैं। मरीज एक अस्पताल से दूसरे अस्पताल में धक्के खा रहे हैं। स्पेशलिस्ट डॉक्टरों की कमी है और महंगी-महंगी मशीने रखे-रखे जंग खा रही हैं। इतना नहीं निजी अस्पतालो में मरीजों से पैसो की खुली लूट होने से लोग परेशान हैं।
