

Allahabad High Court on Agra Conversion Case: करीब एक साल पहले आगरा में धर्मांतरण के एक मामले ने पूरे उत्तर प्रदेश में सनसनी मचा दी थी। पुलिस ने इसे प्रदेश के बड़े धर्मांतरण मामलों में शामिल बताते हुए दावा किया था कि दो सगी बहनों का ब्रेनवॉश कर उनका धर्म परिवर्तन कराया गया और उन्हें एक बड़े नेटवर्क के चंगुल से बाहर निकाला गया। जांच के दौरान इस नेटवर्क की जड़ें अंतरराष्ट्रीय स्तर तक जुड़े होने और विदेशी फंडिंग के इनपुट की बात भी सामने आई थी।
आगरा पुलिस ने दोनों बहनों को कथित धर्मांतरण नेटवर्क से बाहर निकालकर उनके परिजनों के सुपुर्द कर दिया था। उस समय पुलिस की कार्रवाई को बड़ी सफलता के तौर पर पेश किया गया था। लेकिन अब इसी मामले में कहानी ने ऐसा मोड़ लिया है, जिसने पूरे घटनाक्रम पर नए सवाल खड़े कर दिए हैं।
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने आगरा की दो बालिग सगी बहनों से जुड़े मामले में महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए कहा है कि हर बालिग व्यक्ति को अपनी पसंद का धर्म, आस्था और जीवनसाथी चुनने का मौलिक अधिकार है। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि माता-पिता अपनी संतान के फैसले से असहमत हो सकते हैं, लेकिन किसी बालिग व्यक्ति की व्यक्तिगत स्वतंत्रता को छीन नहीं सकते।
मामला हाईकोर्ट में बंदी प्रत्यक्षीकरण यानी हेबियस कॉर्पस याचिका के जरिए पहुंचा था। याचिका में आरोप था कि दोनों बहनों को उनकी इच्छा के विरुद्ध घर में रखा गया।
कोर्ट ने सुनवाई के दौरान पुलिस और प्रशासन की भूमिका पर भी नाराजगी जताई। अदालत का कहना था कि यदि दोनों महिलाएं बालिग हैं और अपनी इच्छा से जीवन जीना चाहती हैं तो उनकी स्वतंत्रता में किसी तरह का हस्तक्षेप नहीं किया जा सकता।
हाईकोर्ट ने पिता और उत्तर प्रदेश सरकार को संयुक्त रूप से 25 लाख रुपये मुआवजा देने का आदेश दिया है। साथ ही पिता को निर्देश दिया गया है कि दोनों बहनों के पासपोर्ट, शैक्षणिक प्रमाण पत्र और अन्य निजी दस्तावेज उन्हें सौंपे जाएं और उनकी जिंदगी में हस्तक्षेप न किया जाए।
यानी जिस मामले में करीब एक साल पहले धर्मांतरण, ब्रेनवॉश, नेटवर्क और विदेशी फंडिंग जैसे गंभीर आरोपों ने सुर्खियां बटोरी थीं, उसी मामले में अब हाईकोर्ट ने व्यक्ति की धार्मिक स्वतंत्रता और निजी पसंद को केंद्र में रखते हुए बड़ा फैसला सुनाया है।
हालांकि, पुलिस जांच में लगाए गए पूर्व आरोपों और हाईकोर्ट के मौजूदा फैसले के बीच कानूनी स्थिति को अलग-अलग समझना जरूरी है। अदालत का यह फैसला इस बात पर केंद्रित है कि बालिग व्यक्ति को अपनी इच्छा से धर्म और जीवनसाथी चुनने की स्वतंत्रता है।
अब इस फैसले ने आगरा के उस चर्चित धर्मांतरण प्रकरण की पूरी कहानी को एक नए कानूनी और संवैधानिक नजरिए से बहस के केंद्र में ला दिया है।