

Hindu Mahasabha Reaction Allahabad HC Verdict: करीब एक साल पहले आगरा से सामने आए चर्चित धर्मांतरण प्रकरण में इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले के बाद अब राजनीतिक और सामाजिक संगठनों की प्रतिक्रियाएं सामने आने लगी हैं। अदालत ने दो बालिग सगी बहनों की कथित अवैध हिरासत के मामले में महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए स्पष्ट किया कि बालिग व्यक्ति को अपनी आस्था, धर्म, जीवनसाथी और जीवन से जुड़े निजी फैसले लेने की स्वतंत्रता है। मामले में पिता और उत्तर प्रदेश सरकार को संयुक्त रूप से 25 लाख रुपये मुआवजा देने का आदेश भी दिया गया है।
अदालत के फैसले ने आगरा में धर्मांतरण की जांच से जुड़े पुराने घटनाक्रम को एक बार फिर चर्चा के केंद्र में ला दिया है। करीब एक साल पहले आगरा पुलिस ने दो सगी बहनों से जुड़े मामले को धर्मांतरण नेटवर्क के रूप में पेश किया था। पुलिस की जांच में कथित तौर पर नेटवर्क के अंतरराष्ट्रीय कनेक्शन और विदेशी फंडिंग की दिशा में जांच की बात सामने आई थी। पुलिस ने दोनों बहनों को बरामद कर परिजनों को सौंपा था।
अब हाईकोर्ट के फैसले के बाद अखिल भारत हिंदू महासभा खुलकर सामने आ गई है। संगठन के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष अज्जू चौहान ने फैसले पर सवाल उठाते हुए कहा कि यदि धर्मांतरण के मामलों में पुलिस अधिकारियों और कर्मचारियों द्वारा की गई कार्रवाई पर ही सवाल खड़े होंगे तो भविष्य में ऐसे मामलों की जांच करने वाले अधिकारियों का मनोबल प्रभावित हो सकता है। उन्होंने कहा कि पुलिस ने जिन आरोपों और इनपुट के आधार पर कार्रवाई की थी, उनमें विदेशी फंडिंग और अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क की बात सामने आई थी और अधिकारियों ने जोखिम उठाकर कार्रवाई की थी।
अज्जू चौहान ने इसी संदर्भ में ‘गजवा-ए-हिंद’ को लेकर भी चिंता जताई और कहा कि भारत को किसी भी तरह की कट्टरपंथी विचारधारा की दिशा में जाने से रोकना जरूरी है। हालांकि, उनके इस दावे की स्वतंत्र पुष्टि नहीं है और इसे संगठन की राजनीतिक प्रतिक्रिया के रूप में ही देखा जाना चाहिए।
प्रदेश प्रवक्ता अवतार सिंह गिल ने इससे भी आगे बढ़कर धर्मांतरण और अंतरधार्मिक संबंधों को लेकर गंभीर आशंकाएं जताईं। उन्होंने आरोप लगाया कि हिंदू, सिख, जैन और बौद्ध समुदाय की युवतियों को निशाना बनाए जाने की घटनाएं सामने आती रही हैं। उन्होंने कुछ कथित मामलों का हवाला देते हुए कहा कि जब ऐसी घटनाओं में बेटियों की जान चली जाती है तो व्यापक बहस नहीं होती, लेकिन धर्मांतरण के मामलों में कार्रवाई करने वाली पुलिस के सामने भी अब सवाल खड़े हो रहे हैं।
अखिल भारत हिंदू महासभा की जिला अध्यक्ष मीरा राठौर ने भी हाईकोर्ट के फैसले को लेकर चिंता जताई। उनका कहना है कि अदालत का फैसला धर्मांतरण के लिए सक्रिय कथित गिरोहों को मनोवैज्ञानिक बढ़त दे सकता है। उन्होंने कहा कि संगठन किसी भी ऐसी गतिविधि का विरोध करेगा जिसमें दबाव, धोखे या प्रलोभन के जरिए किसी व्यक्ति का धर्म परिवर्तन कराया जाए।
यही वह बिंदु है जहां आगरा का यह मामला अब स्थानीय विवाद से निकलकर राष्ट्रीय बहस का रूप लेता दिखाई दे रहा है। एक तरफ संविधान के तहत किसी बालिग व्यक्ति की धर्म, आस्था, निजी जीवन और जीवनसाथी चुनने की स्वतंत्रता का सवाल है। दूसरी तरफ संगठित, जबरन या धोखे से कराए जाने वाले धर्मांतरण की शिकायतों पर पुलिस की कार्रवाई और उसकी वैधता का सवाल है।
इलाहाबाद हाईकोर्ट का मौजूदा फैसला मुख्य रूप से दोनों महिलाओं की व्यक्तिगत स्वतंत्रता और कथित अवैध हिरासत से जुड़ा है। इसे अपने आप में किसी कथित धर्मांतरण नेटवर्क को क्लीन चिट के रूप में पढ़ना भी सही नहीं होगा।
दूसरी ओर, अदालत का यह रुख भी साफ है कि किसी बालिग व्यक्ति को केवल उसके धर्म या निजी पसंद के कारण उसकी इच्छा के विरुद्ध हिरासत में नहीं रखा जा सकता।
यही विरोधाभास अब आगरा के इस मामले को एक बड़े सवाल के सामने खड़ा करता है- क्या धर्मांतरण के खिलाफ कार्रवाई और बालिग व्यक्ति की धार्मिक स्वतंत्रता के बीच ऐसा कानूनी संतुलन बनाया जा सकता है, जिसमें न जबरन धर्मांतरण को संरक्षण मिले और न किसी बालिग की संवैधानिक आजादी छीनी जाए?
आगरा के चर्चित मामले में हाईकोर्ट के आदेश के बाद अब यही बहस केवल आगरा तक सीमित नहीं है। धर्मांतरण, व्यक्तिगत स्वतंत्रता, पुलिस की भूमिका और संवैधानिक अधिकारों को लेकर देशभर में इस फैसले के दूरगामी प्रभाव पर चर्चा शुरू हो गई है।