

Agra Collectorate Land Dispute: आगरा कलेक्ट्रेट परिसर की बेशकीमती जमीन को लेकर जिला प्रशासन और वक्फ पक्ष के बीच विवाद गहरा गया है। करीब 30 हजार वर्गमीटर में फैले कलेक्ट्रेट परिसर की लगभग 10 हजार वर्गमीटर जमीन पर प्रशासन ने अवैध कब्जे का मामला सामने आने का दावा किया है। प्रशासन के मुताबिक करीब एक लाख वर्गफुट जमीन पर पिछले लगभग 25 वर्षों से एक ट्रस्ट और अन्य लोगों का कब्जा है। वहीं दूसरी ओर अंजुमन मोहमदिया सोसाइटी ने प्रशासन के दावे को खारिज करते हुए संबंधित जमीन पर 132 वर्षों से कब्जा होने का दावा किया है।
वक्फ पक्ष के मुताबिक विवादित संपत्ति वक्फ नंबर 152 के अंतर्गत आती है और इसकी गाटा संख्या 431 है। सोसाइटी पदाधिकारियों का कहना है कि तहसील सदर के राजस्व अभिलेखों में यह जमीन नजूल की नहीं है, जबकि प्रशासन इसे अपनी संपत्ति के तौर पर पेश कर रहा है। वक्फ पक्ष का दावा है कि इस संपत्ति के मूल मालिक ग्यास अहमद थे, जिन्होंने अपनी जमीन वक्फ कर दी थी।
वर्तमान में अंजुमन मोहमदिया सोसाइटी वक्फ नंबर 152 के अंतर्गत आने वाली संपत्तियों की देखरेख और निगरानी कर रही है। सोसाइटी पदाधिकारियों का कहना है कि उनके पास इस संपत्ति पर 132 वर्षों से कब्जे और प्रबंधन का इतिहास है। ऐसे में प्रशासन की ओर से इसे 25 वर्षों से अवैध कब्जा बताना अपने आप में सवाल खड़े करता है।
बताया गया है कि जिलाधिकारी मनीष बंसल के कलेक्ट्रेट परिसर के निरीक्षण और सरकारी अभिलेखों की जांच के दौरान जमीन का यह मामला सामने आया। प्रशासन के अनुसार रिकॉर्ड में कलेक्ट्रेट परिसर की कुल करीब 30 हजार वर्गमीटर भूमि दर्ज है, लेकिन करीब 20 हजार वर्गमीटर पर ही प्रशासन का प्रत्यक्ष कब्जा पाया गया। शेष करीब 10 हजार वर्गमीटर जमीन पर ट्रस्ट और अन्य लोगों के कब्जे की बात सामने आई।
प्रशासन ने संबंधित कब्जाधारकों को नोटिस जारी कर 14 सितंबर 2026 तक जवाब मांगा है। निर्धारित अवधि में जमीन खाली नहीं करने की स्थिति में प्रशासन की ओर से करीब 30 करोड़ रुपये क्षतिपूर्ति तथा लगभग 1.25 करोड़ रुपये प्रतिवर्ष की दर से जुर्माना वसूलने की चेतावनी दी गई है।
वहीं, वक्फ कमेटी के सहायक सचिव हाजी जमीलुद्दीन कुरैशी ने प्रशासन के आरोपों को बेबुनियाद बताया है। उनका कहना है कि स्थिति इसके उलट है और प्रशासन स्वयं वक्फ की जमीन पर काबिज है। उन्होंने दावा किया कि प्रशासन की ओर से पहले इस जमीन का किराया वक्फ पक्ष को दिया जाता था, लेकिन 2006 के बाद किराया देना बंद कर दिया गया।
हाजी जमीलुद्दीन कुरैशी के मुताबिक किराए और जमीन के अधिकार को लेकर प्रयागराज हाईकोर्ट में मामला लंबित है। वक्फ पक्ष का कहना है कि जब जमीन के स्वामित्व को लेकर न्यायालय में वाद विचाराधीन है, तो प्रशासन की ओर से खुद को जमीन का मालिक बताते हुए कब्जाधारकों को नोटिस जारी करना सवाल खड़े करता है।
वक्फ पक्ष इसे प्रशासन की 'सीना जोरी' करार दे रहा है। उसका तर्क है कि यदि प्रशासन स्वयं किराएदार की स्थिति में रहा है तो अब उसी जमीन पर मालिकाना हक का दावा कैसे किया जा सकता है।
फिलहाल इस पूरे विवाद में दो अलग-अलग दावे आमने-सामने हैं। प्रशासन अपने रिकॉर्ड के आधार पर करीब 10 हजार वर्गमीटर जमीन को सरकारी संपत्ति बताते हुए कब्जा हटाने की कार्रवाई की तैयारी में है, जबकि वक्फ पक्ष वक्फ नंबर 152, गाटा संख्या 431 और 132 वर्षों से कब्जे का हवाला दे रहा है।
ऐसे में असली सवाल यही है कि कलेक्ट्रेट परिसर की यह बेशकीमती जमीन आखिर किसकी है- उत्तर प्रदेश सरकार की या वक्फ की? राजस्व अभिलेखों में जमीन के नजूल नहीं होने और ग्यास अहमद द्वारा इसे वक्फ किए जाने के दावे के बीच प्रशासन के नोटिस ने विवाद को और पेचीदा बना दिया है। चूंकि मामला हाईकोर्ट में लंबित बताया जा रहा है, इसलिए जमीन के मालिकाना हक की अंतिम तस्वीर न्यायालय के फैसले के बाद ही साफ होगी। फिलहाल, 14 सितंबर तक अंजुमन मोहमदिया सोसाइटी को प्रशासन के सामने अपना पक्ष रखना है। अगर कमेटी द्वारा पक्ष नहीं रखा गया तो 30 करोड रुपये के साथ-साथ 1.25 करोड़ रूपये प्रतिवर्ष के अनुसार अदा करना होगा।