वोटर लिस्ट में अपना नाम देखते लोग।
Uttar Pradesh Voter List: पिछले दिनों पश्चिम बंगाल में नोबेल पुरस्कार विजेता अर्थशास्त्री अमर्त्य सेन को विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) का नोटिस मिला, क्योंकि मतदाता सूची में उनके और उनकी मां की उम्र में 15 वर्ष से कम का अंतर था। चुनाव आयोग के सॉफ्टवेयर ने लॉजिकल एरर के नाम पर इसे पकड़ा था। उत्तर प्रदेश में भी एसआईआर के अंकशास्त्र में अमर्त्य सेन जैसे लाखों मामले सामने आए हैं। आयोग ने लॉजिकल एरर श्रेणी में प्रदेश में 1.93 करोड़ मतदाताओं को चिह्नित किया है।
यह संख्या वर्ष 2003 की मतदाता सूची से रिकार्ड नहीं मिलने वाले 1.04 करोड़ मतदाताओं से अलग है। लॉजिकल एरर में 83 लाख तो ऐसे मतदाता हैं, जिनके पिता के नाम मेल नहीं खा रहे। किसी के नाम की स्पेलिंग गलत है तो किसी का नाम अधूरा है। सॉफ्टवेयर ने मतदाताओं के रिकार्ड मिलाने में 5 तरह के लॉजिकल एरर पकड़ते हैं। इन मतदाताओं की 2003 की मतदाता सूची से मैपिंग हो गई है, लेकिन वे संदेह के घेरे में हैं। इनमें पहला पिता का नाम 2003 की मतदाता सूची से मेल न खाना है।
इस श्रेणी के मतदाताओं के लिए राहत की बात है कि पिता का नाम मेल नहीं खाने वालों को चुनाव आयोग द्वारा नोटिस नहीं दी जाएगी। बीएलओ ऐसे मतदाताओं के घर आकर प्रमाण पत्र देखेंगे। फिर उसे एप पर ठीक कर देंगे। दूसरी श्रेणी में ऐसे मतदाताओं के नाम हैं, जिनके 6 या 6 से अधिक बेटों ने मैपिंग की है। इसमें भी आयोग यह देख सकता है कि क्या वाकई में ऐसे परिवार हैं, जिनके इतने अधिक बेटे हैं। तीसरी श्रेणी में ऐसे नाम आए हैं, जिनमें मतदाता और उनके अभिभावक की आयु में 15 साल से कम का अंतर है।
साफ्टवेयर ने चौथी श्रेणी में ऐसे मतदाताओं के नाम छांटे हैं, जिनमें बाबा और पौत्र-पौत्री की उम्र में 50 वर्ष से कम का अंतर है। ऐसे मामले संदेह पैदा करते हैं। पांचवीं श्रेणी में वो मतदाता रखे गए हैं, जो इस समय 45 वर्ष या उससे ज्यादा उम्र के हैं। पिछले एसआईआर यानी 2003 की मतदाता सूची में उनके माता-पिता का तो नाम है, लेकिन उनका नाम दर्ज नहीं है।
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ऐसे मतदाताओं को नोटिस मिलेगा या केवल जांच कराई जाएगी, यह चुनाव आयोग ने स्पष्ट नहीं किया है। वैसे, पश्चिम बंगाल और दूसरे राज्यों में जिस तरह से लॉजिकल एरर वाले मतदाताओं को नोटिस जारी हुए हैं, उससे यहां भी भविष्य में नोटिस दिए जाने की संभावना से इन्कार नहीं किया जा सकता है।