गोकुल की छड़ीमार होली खेलने के लिए घूम आएं ये जगह, जानें कैसे शुरू हुई परंपरा
Holi Places in Gokul: होली भारत के हर राज्य और शहर में अलग-अलग तरीके से मनाई जाती है। मथुरा-वृंदावन की गलियों में इसका अलग ही अनुभव देखने को मिलता है। बृज की होली देखने के लिए लोग दूर दूर से आते हैं। यहां के मंदिरों में बहुत ही शानदार तरीके से होली का पर्व मनाया जाता है। वहीं भगवान कृष्ण की नगरी गोकुल में भी होली बहुत ही अलग अंदाज में मनाई जाती है। होली के अवसर पर यहां की कुछ जगहों को घूमने का प्लान किया जा सकता है। यहां पर छड़ीमार होली बहुत ही प्रसिद्ध है।
गोकुल में छड़ीमार होली खेलने की शुरुआत नंद किले के नंद भवन में ठाकुरजी के सामने राजभोग लगाकर होती है। भगवान कृष्ण का जन्म मथुरा में हुआ था लेकिन उनका बचपन गोकुल में बीता था। इसी वजह से गोकुल वासी आज भी भगवान कृष्ण को पूजते हैं। यहां पर होली बृज की होली से अलग होती है। जिसकी वजह से इसे लट्ठमार नहीं बल्कि छड़ीमार होली कहा जाता है।
रमण रेती गोकुल की बहुत ही खूबसूरत जगह है जहां भगवान कृष्ण बचपन में रेत के ऊपर लीलाएं करने के साथ खेलते थे। आज भी यहां पर लोग रेत में लोट लगाते हैं। यहां पर अनेक ऋषि मुनि निवास करते हैं। यहां पर आप घूमने के लिए आ सकते हैं। इसके अलावा चौरासी खंभा भी यहां की प्रसिद्ध जगह है। इसे नंद भवन के नाम से भी जाना जाता है।
यमुना नदी के किनारे स्थित ठकुरानी घाट भी गोकुल की प्रसिद्ध जगह है। यहां का शांत वातावरण मन को मोह लेगा। कहा जाता है कि इसी घाट पर मां यशोदा कृष्ण जी को स्नान के लिए लाया करती थीं। होली पर यहां कई लोग घूमने के लिए आते हैं।
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छड़ीमार होली के पीछे एक दिलचस्प कथा जुड़ी हुई है। कहा जाता है कि कान्हा अपनी अठखेलियों से गोपियों को तंग किया करते ते। जिसकी वजह से गोपियां कान्हा को सबक सिखाने के लिए उनके पीछे छड़ी लेकर भागा करती थीं। ऐसा कान्हा को डराने के लिए किया जाता था। इसी वजह से आज तक गोकुल में छड़ीमार होली खेली जाती है। इसमें लट्ठ की जगह छड़ी का इस्तेमाल किया जाता है। यह अपने आराध्य कृष्ण के प्रति प्रेम और भक्ति के प्रतीक को दर्शाता है।