Africa Delivery Apps: अफ्रीका के होम डिलीवरी ऐप्स IND के स्टार्टअप्स से सीख सकते हैं डिलीवरी का तरीका: रिपोर्ट

Africa Delivery Apps Indian Startups: अफ्रीका में बिना उचित पते के होम डिलीवरी चुनौती बनी हुई है। रिपोर्ट में भारतीय स्टार्टअप्स के लैंडमार्क, डेटा और मशीन लर्निंग मॉडल से सीखने की सलाह दी गई है।
Africa Delivery Apps
अफ्रीका के होम डिलीवरी ऐप्स भारत के स्टार्टअप्स से सीख सकते हैं डिलीवरी का तरीका सोर्स-एआई नीर्मित
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Africa Delivery Technology: अफ्रीका के कई शहरों में होम डिलीवरी कंपनियां बिना उचित पते के कारण सामान पहुंचाने की चुनौती से जूझ रही हैं। एक रिपोर्ट के मुताबिक, इस समस्या से निपटने में भारतीय स्टार्टअप्स का अनुभव अफ्रीकी कंपनियों के लिए उपयोगी साबित हो सकता है। रिपोर्ट में बताया गया है कि नैरोबी और लागोस जैसे शहरों की कई बस्तियां पारंपरिक पोस्टल कोड व्यवस्था के तहत विकसित नहीं हुई हैं।

ऐसे में भारतीय कंपनियों की तरह लैंडमार्क, डिलीवरी हिस्ट्री और मशीन लर्निंग आधारित लोकेशन इंटेलिजेंस का इस्तेमाल किया जा सकता है। करीब एक दशक पहले भारत में भी ग्राहकों के पते अक्सर स्थानीय पहचान और लैंडमार्क के आधार पर बताए जाते थे। भारतीय स्टार्टअप्स ने लॉजिस्टिक्स को केवल ट्रक और गोदाम की समस्या मानने के बजाय डेटा और भरोसे की चुनौती के रूप में देखा।

बिना पते डिलीवरी की चुनौती से जूझ रहा अफ्रीका

इंडिया नैरेटिव में प्रकाशित चुक्वुडी ओकेके के आर्टिकल में कहा गया है कि नैरोबी की बस्तियां और लागोस की अनौपचारिक बस्तियां कभी पोस्टल कोड को ध्यान में रखकर विकसित नहीं की गई थीं और जल्द ही वहां पोस्टल कोड मिलने की संभावना भी नहीं है। यह समस्या कभी स्थायी बाधा जैसी लगती थी।

लैंडमार्क से आसान हो सकती है डिलीवरी

लेकिन दुनिया के दूसरे हिस्सों में इसी समस्या का सामना कर रही कंपनियों ने लैंडमार्क, डिलीवरी हिस्ट्री और मशीन लर्निंग की मदद से इसका समाधान निकाला। समय के साथ किसी स्थान की सही पहचान करने की क्षमता बढ़ती गई और अंततः स्थायी पता न होना असफल डिलीवरी का बहाना नहीं रह गया।

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भारत की लॉजिस्टिक्स रणनीति से सीखने की सलाह

यह समस्या केवल अफ्रीका तक सीमित नहीं है और यही महत्वपूर्ण बात है, क्योंकि इसका मतलब है कि इसका समाधान संभव है। करीब एक दशक पहले भारत भी इसी तरह की अव्यवस्थित स्थिति से गुजर रहा था, जहां पता बताने का मतलब होता था, दूसरे स्पीड ब्रेकर के आगे नीले गेट के पास।

आर्टिकल के अनुसार, भारत के स्टार्टअप्स ने इस अव्यवस्था से बाहर निकलने के लिए अपनी सोच में बदलाव किया। उन्होंने लॉजिस्टिक्स को पहले डेटा और भरोसे की समस्या माना और उसके बाद ट्रकों तथा गोदामों की समस्या। यही सोच में बदलाव, किसी खास ऐप से ज्यादा महत्वपूर्ण है, जिसका अध्ययन केन्या और नाइजीरिया के उद्यमियों और नीति निर्माताओं को करना चाहिए।

छोटे शहरों में डिलीवरी नेटवर्क बढ़ाने की जरूरत

आर्टिकल में कहा गया है कि सरकार द्वारा पता प्रणाली को ठीक करने का इंतजार करने के बजाय लॉजिस्टिक्स स्टार्टअप्स को अपनी लोकेशन इंटेलिजेंस विकसित करनी चाहिए। उन्हें हर सफल और असफल डिलीवरी से सीखते हुए उपभोक्ता के सटीक स्थान तक पहुंचने की समस्या का समाधान करना चाहिए।

टोल रिकॉर्ड और कस्टम्स डेटा को उपलब्ध कराया

आर्टिकल में कहा गया है, “एक संरचनात्मक विकल्प सीधे अपनाने लायक है। सरकार को निजी कारोबार की प्रतिद्वंद्वी के बजाय इंफ्रास्ट्रक्चर प्रदाता के रूप में देखा जाना चाहिए।” कई जगहों पर सरकार ने अपनी डिलीवरी-ट्रैकिंग प्रणाली खुद बनाने के बजाय वाहन पंजीकरण, लाइसेंसिंग, टोल रिकॉर्ड और कस्टम्स जैसे मौजूदा डेटा को सरल डिजिटल इंटरफेस के जरिए उपलब्ध कराया, जिससे निजी स्टार्टअप्स उनका आसानी से इस्तेमाल कर सकें।

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