अमेरिका ईरान तनाव( सोर्स: सोशल मीडिया )
Iran Nuclear Deal Failure: अमेरिका और ईरान के बीच कोई समझौता नहीं हुआ। इस्लामाबाद में वार्ता बिना किसी डील के समाप्त हो गई और अमेरिका के उप-राष्ट्रपति यह कहते हुए वापस लौट गए कि उन्होंने ‘अंतिम व सर्वश्रेष्ठ प्रस्ताव रखा था।
दूसरी ओर ईरान को पहले ही वार्ता की सफलता पर शक था, क्योंकि दो बार पहले जब वार्ताएं एकदम सही दिशा में जाते हुए समझौते के कगार पर पहुंचने वाली थीं, तो अमेरिका ने धोखा दे दिया था।
जिनेवा में जब दूसरी वार्ता हुई, तो उसमें शामिल ब्रिटेन के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार जोनाथन पॉवेल को ‘आश्वर्य’ हुआ था कि तेहरान अपने परमाणु कार्यक्रम पर वॉशिंगटन की हर बात मानने को तैयार हो गया था व वियना में तकनीकी वार्ता के लिए तिधि पर भी सहमति बन गई थी, तो अमेरिका व इजराइल ने ईरान पर 28 फरवरी की सुबह बेमतलब पुनः युद्ध थोप दिया था।
मिनाब में 168 स्कूलों की बच्चियों की हत्या कर दी, तब से होमुंज में बहुत पानी बह चुका है। अब भारी नुकसान व अपनी टॉप लीडरशिप को खोने के बावजूद तेहरान वॉशिंगटन की ‘अनुचित’ मांगों को ठुकराने की स्थिति में है और अमेरिका अपनी मनमानी थोपने की स्थिति में नहीं रहा है।
रूस व चीन भी सुपरपावर के रूप में उभर चुके हैं और वह ईरान के समर्थन में खड़े हैं। इस बीच अमेरिका के राष्ट्रपति ट्रंप ने कहा है कि वॉशिंगटन ने बुद्ध जीत लिया है।
उसके 2 जहाज स्ट्रेट ऑफ होमुंज से गुजरे हैं समुद्री माइंस को ‘क्लियर’ करते हुए, जबकि ईरान ने इस दावे का खंडन करते हुए चेतावनी दी है कि कोई भी सैन्य जहाज होमुंज को अगर पार करने का प्रयास करेगा तो उसे ‘भयावह प्रतिक्रिया’ का सामना करना पड़ेगा।
उधर दक्षिण लेबनान में इजराइल की एयर स्ट्राइक्स जारी है और हिजबुल्लाह भी जवाबी कार्रवाई कर रहा है। अमेरिका व ईरान में उच्चस्तरीय व आमने-सामने की वार्ता लगभग 47 साल बाद हुई, लेकिन अविश्वास के वातावरण में हुई इस 21 घंटे की वार्ता का कोई नतीजा निकलना ही नहीं था।
इस्लामाबाद में अमेरिका के तरफ से जो 15 पॉइंट्स रखे गए व ईरान की तरफ से जो 10 पॉइंट्स रखे गए, उनमें अन्य विवाद भी शामिल हुए। अमेरिका इस बात का वायदा करने के लिए तैयार नहीं था कि वह लेबनान के खिलाफ इजराइली आक्रमण पर विराम लगाएगा।
अमेरिका ने होर्मुज की सुरक्षा पर जो शर्त रखी वह ईरान को स्वीकार नहीं थी। यही विवाद के बिंदु आखिरकार मुख्य अड़चन बन गए। वार्ता इस पृष्ठभूमि में टूटी कि इजराइल ने बैरुत पर अंधाधुंध गोलाबारी की, जिसमें सैकड़ों निदर्दोष लोग मारे गए और जिसकी व्यापक निंदा हुई है व इसे युद्धविराम के उल्लंघन के रूप में देखा जा रहा है।
2 सप्ताह के युद्धविराम पर नेतन्याहू की गुस्साभरी प्रतिक्रिया सामने आई थी। युद्धविराम घोषित होते ही इजराइल ने बैरुत के नागरिकों पर बमबारी करनी शुरू कर दी ताकि ईरान को उकसाया जा सके और युद्धविराम विफल हो जाए।
लेकिन ईरान ने युद्धविराम को जारी रखा, इस घोषणा के साथ कि लेबनान में अपने साथियों को वह अकेला नहीं छोड़ेगा। अमेरिका व ईरान के बीच जो 3 असफल वार्ताएं अब तक हुई हैं, उन सभी में ट्रंप के यहूदी दामाद जरेड कुशनर व ट्रंप के करीबी दोस्त रियल एस्टेट निवेशक स्टीव विटकोफ शामिल रहे हैं।
यह दोनों ही नेतन्याहू के करीबी हैं और अमेरिकी विशेषज्ञों के अनुसार नेतन्याहू के लिए ही काम करते हैं, जबकि यह न तो अमेरिकी प्रशासन में कुछ हैं और न ही इन्हें कूटनीति का कोई अनुभव है। इस स्थिति में इस्लामाबाद में वातों का विफल होना तय ही था।
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अमेरिका में भी युद्ध का जनविरोध व ट्रंप को हटाने के लिए अनुच्छेद 25 लागू करने की मुहिम तेज है, सऊदी अरब के रक्षा मंत्रालय ने घोषणा की है कि संयुक्त रणनीतिक रक्षा समझौते के तहत उसके पूर्वी सेक्टर में स्थित किंग अब्दुल अजीज एवर बेस की सुरक्षा करने के लिए पाकिस्तान का सैन्य बल वहां पहुंच गया है, जिससे लगता है कि सऊदी अरब अमेरिका पर अपनी रक्षा निर्भरता कम करते हुए ईरान से संबंध बेहतर करने का इच्छुक है और चीन ने ईरान को एयर डिफेंस सिस्टम दिया है। इस पृष्ठभूमि में ट्रंप कह रहे हैं कि वह वेनेजुएला की तरह ईरान का नेवल ब्लॉकेड करेंगे और अपनी शर्ते मनवाएंगे।
लेख-शाहिद ए चौधरी के द्वारा