नवभारत विशेष: महिलाओं को लेकर समाज नहीं बदल रहा, बदलती सोच की दो अहम कहानियां
Women Freedom Debate: हाल की दो घटनाएं दिखाती हैं कि महिलाएं अब अपने जीवन के फैसले खुद लेने लगी हैं। यह बदलाव समाज में नारी स्वतंत्रता की मजबूत होती आवाज का संकेत है।
- Written By: अंकिता पटेल
नारी स्वतंत्रता( सोर्स: सोशल मीडिया )
India Women Choice Marriage Rights: हाल में दो खबरों ने चौंकाया। एक यह कि मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की ग्वालियर बेंच ने एक विवाहित महिला को अपनी पसंद के व्यक्ति के साथ रहने की अनुमति प्रदान की, जबकि उसके माता-पिता व पति इस पक्ष में नहीं थे।
दूसरी खबर मेरठ से है, जहां एक रिटायर्ड न्यायाधीश ने अपनी तलाकशुदा बेटी का स्वागत बैंड-बाजा, फूलों व मिठाई से किया। ये दोनों खबरें नारी मुक्ति और औरत के स्वतंत्र रूप से निर्णय लेने के संदर्भ में क्या कहती हैं? यह अपवाद हैं या बदलते समाज का प्रभावी संकेत ? एक 19 वर्षीय लड़की की शादी एक 40 वर्षीय व्यक्ति से कर दी गई थी, जो तथाकथित तौर पर उसके साथ अच्छा व्यवहार नहीं करता था।
लड़की ने अपने माता-पिता से शिकायत की, लेकिन उन्होंने कोई मदद न की। इस बीच लड़की को एक ऐसा व्यक्ति मिल गया, जो उसे सम्मान व आश्रय देने के लिए तैयार था।
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वह उसके साथ रहने लगी। उसके पति ने हेबियस कार्पस याचिका दायर की। लड़की ने अदालत में अपने पति, पैरेंट्स व जिस युवक के साथ वह रह रही है की उपस्थिति में बयान दिया कि उसका पति व उसके पैरेंट्स उसके साथ अच्छा व्यवहार नहीं करते हैं, जबकि जिस युवक के साथ वह रह रही है।
वह उसे आजादी प्रदान करता है और इसलिए वह उसके साथ ही रहना चाहती है। फलस्वरूप मध्य प्रदेश हाईकोर्ट के न्यायाधीश आनंद पाठक व न्यायाधीश पुष्पेंद्र यादव की खंडपीठ ने 2 अप्रैल 2026 के आदेश में इस विवाहित लड़की को अपनी पसंद के युवक के साथ रहने की अनुमति दे दी।
लड़की को 6 माह के लिए राज्य की शौर्य दीदी फ्रेमवर्क के तहत रखा गया है और सरकारी वकील अंजलि ज्ञानानी व कांस्टेबल भावना उसकी शौर्य दीदी होंगी। लड़की के तलाक के बाद युवक उससे शादी करने का इरादा रखता है, ऐसा उसने अदालत से कहा।
हमारे समाज में आज भी तलाक को ‘कलंक ही समझा जाता है, विशेषकर महिला के लिए, मेरठ में रिटायर्ड न्यायाधीश ज्ञानेंद्र कुमार शर्मा ने इसी सामाजिक धारणा को चुनौती दी।
उनकी बेटी प्रणिता का विवाह 19 दिसंबर 2018 को शाहजहांपुर के एक आर्मी मेजर से हुआ था, लेकिन जल्द ही संबंधों में खटास आनी शुरू हो गई और प्रणिता ने अपनी ससुराल में मानसिक, शारीरिक व भावनात्मक उत्पीड़न के आरोप लगाए, एक बेटे के जन्म के बावजूद पत्नी व पति के संबंधों में कोई सुधार नहीं आया जिसके फलस्वरूप प्रणिता ने तलाक ले लिया, तलाक लेकर जब प्रणिता 4 अप्रैल 2026 को मेरठ स्थित अपने पिता के घर लौटी तो उन्होंने अपने परिवार, रिश्तेदारों व दोस्तों के साथ मिलकर बैंड-बाजा, फूल मालाओं व मिठाई से उसका स्वागत किया।
इस स्वागत समारोह में शामिल अधिकतर सदस्यों ने काली टी-शर्ट पहनी हुई थी, जिस पर ‘आई लव माई डॉटर’ लिखा हुआ था। इस परिवार ने गुजारा भत्ता की मांग नहीं की है। शर्मा के अनुसार, ‘अगर मेरी बेटी शादी में खुश नहीं है, तो यह मेरी जिम्मेदारी है कि मैं उसे उस वातावरण से बाहर निकालू, सामाजिक उम्मीदों से बढ़कर उसके सम्मान का महत्व है।’
प्रणिता का कहना है, किसी महिला को जुल्म बर्दाश्त नहीं करना चाहिए और न ही खामोश रहना चाहिए, महिलाओं को अपने लिए खड़ा होना चाहिए, स्वतंत्र होना चाहिए और अपने आत्मसम्मान के मूल्य को समझना चाहिए।
इन दोनों ही प्रसंगों में महिला की स्वतंत्रता व आत्मसम्मान साझा है, जिसकी चाहत प्रत्येक आधुनिक महिला को है, लेकिन इसका मिलना परिवार व कानून के समर्थन से ही मुमकिन है, क्योंकि पितृसत्तात्मक समाज कदम-कदम पर रोड़े अटकाने पर लगा रहता है। दरअसल, विवाह को सात जन्मों का रिश्ता मानने में ही समस्या है।
अपवादों पर भले खुश होते रहिए
यह अच्छा है कि विवाह के बंधन में बंधे दो लोग खुशी-खुशी साध रहे, एक-दूसरे का सम्मान करें। एक प्रसन्न परिवार से बढ़कर शायद दुनिया में कोई और चीज नहीं है।
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लेकिन अगर शादी ही नरक बन जाए तो घुट-घुटकर उसमें बने रहना, जुल्म बर्दाश्त करते रहना और अपनी जिंदगी को बर्बाद कर देना कोई अक्लमंदी नहीं है।
लेख-डॉ. अनिता राठौर के द्वारा
