संपादकीय : अब शिवसेना की दशा और दिशा क्या होगी
Maharashtra Politics News: स्थिति यह है कि शिवसेना को दोनों गुट अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहे हैं। इसलिए समाज नीति की उपेक्षा हो रही है। असली शिवसेना कौन सी है, इस फैसले की राह देखना लोगों ने छोड़ दी।
- Written By: दीपिका पाल
अब शिवसेना की दशा और दिशा क्या होगी (सौ. डिजाइन फोटो)
नवभारत डिजिटल डेस्क: यह आरोप कोई मायने नहीं रखता कि शिवसेना को तोड़ने के लिए बीजेपी जिम्मेदार रही है। पहले भी शिवसेना टूटती रही और उसके नेता अलग होते रहे हैं। अपनी स्थापना के बाद से पार्टी में फूट पड़ती रही। समय-समय पर बलवंत मंत्री, बंडू शिंगरे, गणेश नाईक, छगन भुजबल, राज ठाकरे, नारायण राणे जैसे नेता अलग हुए। सबसे जोरदार झटका एकनाथ शिंदे ने अपने विधायकों के साथ अलग होकर दिया और खुद को पार्टी के संस्थापक बाल ठाकरे का सच्चा अनुयायी बताया।
आज भी बाल ठाकरे की अमिट छाप महाराष्ट्र वासियों के मन पर है। दादर के शिवाजी पार्क में उनके स्मृति स्थल पर सोमवार को सभी पार्टियों के नेता पहुंचे जो इस बात का द्योतक है। बाल ठाकरे के बाद शिवसेना एकजुट नहीं रह पाई। उस वृक्ष के पक्षी नया आसमान खोजने उड़ने लगे। जिस मुस्लिम समाज को ठाकरे की हिंदुत्ववादी राजनीति पसंद नहीं आती थी वह भी उनकी पार्टी को मत दिया करते थे। शिवसेना मूल रूप से सामाजिक संगठन था और अब भी है। बाल ठाकरे का कहना था कि 20 प्रतिशत राजनीति और 80 प्रतिशत समाज नीति उनका उद्देश्य है। लोकाधिकार समिति और महिलाओं के सक्रिय सहयोग से शिवसेना ने समाज में मजबूत स्थान बनाया था। प्रखर हिंदुत्व से उसका जनाधार बढ़ा।
आज स्थिति यह है कि शिवसेना को दोनों गुट अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहे हैं। इसलिए समाज नीति की उपेक्षा हो रही है। असली शिवसेना कौन सी है, इस फैसले की राह देखना लोगों ने छोड़ दिया है। जनता को वह शिवसेना चाहिए जो अपने पुराने रूप में आकर नौकरी-रोजगार के लिए मदद करनेवाली, युवाओं के लिए संघर्ष करनेवाली, महिलाओं को संरक्षण देनेवाली हो। इन बुनियादी बातों पर गौर करना पड़ेगा। 2014 से शिवसेना किसी न किसी रूप में सत्ता में रही है। इन 11 वर्षों में 5 वर्ष शिवसेना के पास मुख्यमंत्री पद रहा। उसके वोटों में भी वृद्धि हुई है। पिछले विधानसभा चुनाव में एकनाथ शिंदे की शिवसेना को 80,00,000 मत मिले थे तथा उद्धव ठाकरे गुट ने 64,00,000 से ज्यादा वोट हासिल किए थे।
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यदि दोनों गुटों के वोट मिला लिए जाएं तो यह संख्या बीजेपी के पौने दो करोड़ वोटों के आसपास पहुंचती है। शिवसेना के विधायकों व सांसदों की संख्या बढ़ी है। इतना सब होने पर भी शिवसेना का जनता पर पहले जितना प्रभाव नहीं है। उद्धव के पास ‘ठाकरे’ नाम है लेकिन पार्टी का चुनाव चिन्ह व नाम नहीं रह गया। वह शिवसेना (उबाठा) कहलाती है। असली शिवसेना कौन सी है यह अदालत के फैसले पर निर्भर है। सामने मुंबई महापालिका चुनाव है जहां पता चलेगा कि जनमत किसके साथ जाता है।
लेख-चंद्रमोहन द्विवेदी के द्वारा
