

यूपी की मतदाता सूची में 16.18 लाख संदिग्ध मतदाताओं के नाम जुड़ने का दावा।
आवेदनों और अंतिम सूची के आंकड़ों में 12.92 लाख का अंतर, चुनाव आयोग पर सवाल।
फॉर्म 6 और एनेक्सचर डी को लेकर विवाद, सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी से मामला गरमाया।
तेलंगाना और कर्नाटक में फॉर्म 7 के कथित दुरुपयोग से मतदाताओं के नाम हटाने के आरोप।
Election Commission Voter List Irregularities: उत्तर प्रदेश की संशोधित मतदाता सूची की समीक्षा करते हुए रिपोर्टर्स कलेक्टिव ने पाया कि इसमें बिना फॉर्म 6 और बिना फोटो के 16.18 लाख रहस्यमय मतदाताओं को जोड़ा गया है, जिनकी पहचान को लेकर चुनाव आयोग खामोशी बनाए हुए है, यह कानूनन अवैध है। भारत के चुनाव आयोग ने इन 16.18 लाख मतदाताओं की पहचान सार्वजनिक नहीं की है, जिनके बारे में उसका दावा है कि उनका नाम देश के सबसे अधिक जनसंख्या वाले राज्य में हुई एसआईआर के प्रारंभिक चरणों में जोड़े गए थे।
गौरतलब है कि चुनाव आयोग मतदाता सूची में किसी भी भारतीय नागरिक का नाम उसी सूरत में जोड़ सकता है, जब वह फॉर्म 6 के जरिए आवेदन करे, चुनाव आयोग ने वोटर लिस्ट में शामिल किए जाने के लिए 71.38 लाख आवेदनों की डिटेल्स सार्वजनिक की थी, जिनमें से अधिकतर वह लोग थे, जिनके नाम आयोग ने ड्राफ्ट लिस्ट से हटा दिए थे। लेकिन इसके विपरीत चुनाव आयोग ने फाइनल लिस्ट में 84.3 लाख मतदाता जोड़े। इसका अर्थ यह हुआ कि सार्वजनिक किए गए आवेदनों की तुलना में 12.92 लाख अधिक मतदाता जोड़े गए, यह कानूनन असंभव है।
चूंकि फॉर्म 6 के बिना किसी को वोटर लिस्ट में नहीं जोड़ा जा सकता, इसलिए वोटर लिस्ट में जोड़े गए लोगों की संख्या आवेदन करने वाले लोगों की संख्या से अधिक नहीं हो सकती। इसके अतिरिक्त चुनाव आयोग को कई लाख आवेदन (फॉर्म 7) ड्राफ्ट लिस्ट से नाम हटाने के लिए भी मिले थे, इसलिए इतने अधिक एक्स्ट्रा वोटर्स को सूची में शामिल किया जाना और भी ज्यादा संदिग्ध प्रतीत होता है।
चुनाव आयोग एसआईआर के दौरान यही कहता रहा कि फॉर्म 6 में 'संशोधन' सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर किया गया है। लेकिन अब इस संदर्भ में सुप्रीम कोर्ट में चल रही सुनवाई के दौरान भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने स्पष्ट किया है कि उनकी अदालत ने फॉर्म 6 में 'संशोधन' को मंजूरी नहीं दी थी।
अब चुनाव आयोग का कहना है कि फॉर्म 6 में कोई तब्दीली नहीं की गई थी, सिर्फ नए मतदाताओं के लिए अतिरिक्त घोषणा हेतु एनेक्सचर डी जोड़ा गया था। यह फॉर्म में 'परिवर्तन' करना ही होता है।
इस एनेक्सचर डी को अब हटा दिया गया है, जिससे यह सवाल खड़े हो गए हैं कि इसे किसके कहने पर शामिल किया गया था, किसके कहने पर हटाया गया और जो सॉफ्टवेयर कंपनी संबंधित साईट का प्रबंधन करती है, उसे ऐसा करने के लिए किसने आदेश दिया था? दरअसल, विवाद केवल यहीं तक सीमित नहीं है।
फॉर्म 7, जिसका प्रयोग मतदाता सूची में दर्ज नाम पर आपत्ति दर्ज करने या मतदाता का नाम सूची से हटाने के लिए किया जाता है, को लेकर तेलंगाना में पहली एफआईआर दर्ज की गई है, बीजेपी के एक बीएलए (बूथ लेवल एजेंट) एस। बालचंद्र के खिलाफ आरोप है कि राज्य में चल रही एसआईआर के दौरान उसने फॉर्म 7 में फर्जी जानकारियां भरकर एक विशेष समुदाय के 30 मतदाताओं का नाम वोटर लिस्ट से हटवाने का प्रयास किया।
वैध मतदाताओं को मतदाता सूची से हटाने का खेल अन्य राज्यों से भी प्रकाश में आया है। कर्नाटक के विभिन्न क्षेत्रों में सैंकड़ों की संख्या में प्री-प्रिंटेड फॉर्म 7 दाखिल किए गए मतदाताओं का नाम वोटर लिस्ट से हटवाने के लिए और बीएलए पर दबाव बनाया गया कि वह पहले से भरे हुए इन फॉर्म पर हस्ताक्षर करें।
जनता का चुनावी प्रक्रिया पर से विश्वास उठता जा रहा है, विशेषकर इसलिए भी कि मतदाताओं के फॉर्म 8 (पते में तब्दीली या एंट्री को दुरुस्त कराने के लिए किया जाता है) को चुनाव आयोग का केंद्रीय डिजिटल सिस्टम (ईसीआईनेट) स्वयं ही ठुकरा रहा है। अगर एसआईआर के दौरान ड्राफ्ट सूची में मतदाता का नाम नहीं है।
इस संबंध में चिंतित व परेशान मतदाताओं को हाईकोर्ट तक में दस्तक देनी पड़ रही है। इसलिए अब यह सुप्रीम कोर्ट की जिम्मेदारी है कि वह सुनिश्चित करे कि एसआईआर में कोई वयस्क भारतीय नागरिक वोटर लिस्ट से बाहर न हो और किसी नागरिक को अपने मत अधिकार के लिए अदालत के चक्कर न लगाने पड़ें।
लेख-विजय कपूर के द्वारा