

24 अक्टूबर को संयुक्त राष्ट्र दिवस मनाया जाता है।
81वें वर्ष में प्रवेश के बावजूद स्थायी शांति से दूर संयुक्त राष्ट्र।
वीटो अधिकार वैश्विक युद्धों और संघर्षों को रोकने में बड़ी बाधा बना हुआ है।
India Permanent Seat UNSC: दुनिया में शांति की सबसे अधिक जरूरत शायद उन्हीं दिनों महसूस होती है, जब युद्ध की आशंकाएं सबसे अधिक गहरी हो जाती हैं। 24 अक्टूबर को संयुक्त राष्ट्र दिवस के अवसर पर दुनिया के सामने सवाल केवल इस संस्था की उपलब्धियों का लेखा-जोखा करने का नहीं बल्कि यह पूछने का भी है कि आखिर 8 दशक से अधिक की यात्रा के बाद भी वह स्थायी शांति क्यों नहीं हासिल कर सकी है।
दुनिया ने 1945 में संयुक्त राष्ट्र की स्थापना इस उम्मीद के साथ की थी कि आने वाली पीढ़यों को युद्ध की विभीषिका से बचाया जा सकेगा। संयुक्त राष्ट्र की सबसे बड़ी संस्थागत कमजोरी सुरक्षा परिषद की संरचना में दिखाई देती है। वर्तमान व्यवस्था में इसके 15 सदस्य हैं, जिनमें पांच स्थायी सदस्यों अमेरिका, रूस, चीन, ब्रिटेन और फ्रांस को वीटो का विशेषाधिकार प्राप्त है। इन पांच में से किसी एक का नकारात्मक मत प्रस्ताव को रोक सकता है। यह व्यवस्था उस दौर की है जब द्वितीय विश्वयुद्ध के विजेता देशों ने वैश्विक व्यवस्था की बुनियाद रखी थी। लेकिन 1945 से 2026 तक आते-आते दुनिया में जमीन-आसमान का अंतर हो चुका है।
एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका की राजनीतिक हैसियत संयुक्त राष्ट्र के बनने के समय से अब तक बहुत बदल चुकी है। अनेक विकासशील देश निर्णय प्रक्रिया में अधिक प्रभावी भागीदारी चाहते हैं। इसके बावजूद सुरक्षा परिषद की स्थायी सदस्यता का मूल ढांचा वैसा ही है। वीटो पर जवाबदेही और सुरक्षा परिषद की निष्क्रियता को लेकर लंबे समय से चिंता बनी हुई है।
संयुक्त राष्ट्र लाख कोशिशों के बावजूद दुनिया के दो देशों में छिड़े युद्ध को रोकने में असमर्थ है। इसकी प्रभावशीलता, सदस्य देशों के सहयोग, राजनीतिक इच्छाशक्ति और चार्टर के प्रति युद्धरथ देशों की प्रतिबद्धता पर निर्भर होती है। सुरक्षा परिषद में सुधार की मांग कोई नई बहस नहीं है। सितंबर 2026 में भारत, ब्राजील, जर्मनी और जापान के विदेश मंत्रियों ने सुरक्षा परिषद सुधार की जरूरत पर फिर से जोर दिया। इन देशों का मानना है कि बदली हुई भू-राजनीतिक परिस्थितियों में सुरक्षा परिषद का पुनर्गठन आज पहले से कहीं अधिक जरूरी है।
भारत में यह मुद्दा विशेष महत्व रखता है। दुनिया की बड़ी आबादी, विशाल अर्थव्यवस्था, लोकतांत्रिक ढांचा और संयुक्त राष्ट्र शांति अभियानों में योगदान के आधार पर भारत लंबे समय से सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्यता की मांग करता रहा है। यह मांग केवल राष्ट्रीय प्रतिष्ठा का प्रश्न नहीं है। इसका व्यापक आधार इस तथ्य से जाना जा सकता है कि वैश्विक निर्णयों में उन क्षेत्रों की आवाज भी प्रभावी होनी चाहिए, जिन पर इन निर्णयों का सीधा असर पड़ता है।
सुधार का अर्थ केवल कुछ नये देशों को स्थायी सदस्यता देना भर नहीं है। इन सुधारों में दक्षिण अफ्रीका जैसे ऐतिहासिक रूप से कम प्रतिनिधित्व वाले देश को उचित स्थान देना, परिषद की कार्यप्रणाली में पारदर्शिता बढ़ाना और वीटो पावर के इस्तेमाल पर अधिक जवाबदेही सुनिश्चित करना भी होना चाहिए।
भारत को अपनी स्थायी सदस्यता की दावेदारी जारी रखते हुए विकासशील देशों की आवाज मजबूत करनी चाहिए। खाद्य सुरक्षा, जलवायु परिवर्तन, स्वास्थ्य, आतंकवाद, डिजिटल असमानता और वैश्विक आर्थिक न्याय जैसे विषयों पर भारत की कूटनीति का लक्ष्य केवल अपने हितों की रक्षा करना भर नहीं है बल्कि व्यापक अंतरराष्ट्रीय सहमति बनाना भी है।
भारत का संदेश है कि बहुध्रुवीय दुनिया का अर्थ केवल कई शक्तिशाली देशों का उभरना भर नहीं है बल्कि निर्णय प्रक्रिया का अधिक लोकतांत्रिक होना भी है। भारत ने कई मंचों से यह स्पष्ट कर दिया है कि वह नई विश्व व्यवस्था में स्थायी सदस्यता के तहत आने वाली अपने हिस्से की जिम्मेदारियों को समझता है और उन्हें वहन करने के लिए हर समय तैयार है।
शांति स्थापना, दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में चल रहे संघर्षों की रोकथाम, मानवीय सहायता और अंतर्राष्ट्रीय कानून के सम्मान में सक्रिय भूमिका ही किसी दावेदारी को विश्वसनीय बनाती है। संयुक्त राष्ट्र के 81वें वर्ष में प्रवेश के समय हमें एक बुनियादी सच याद रखना चाहिए कि दुनिया में शांति केवल घोषणाओं से नहीं आती। इसके लिए न्यायपूर्ण संस्थाएं, प्रभावी संवाद, नियमों का समान अनुपालन और शक्तिशाली देशों की जवाबदेही भी आवश्यक है।
लेख- विजय कपूर के द्वारा