नवभारत संपादकीय: TMC में बंटवारा, चुनाव आयोग पर पड़ेगा सुको के निर्णय का असर

TMC Symbol Freeze: टीएमसी के नाम और ‘फूल-घास’ चुनाव चिन्ह पर चुनाव आयोग ने अंतरिम रोक लगाकर दोनों गुटों को नए नाम-चिन्ह दिए हैं। ममता गुट को ‘फुटबॉल खिलाड़ी’ और दूसरे गुट को ‘लिफाफा’ मिला।
TMC Election Commission Decision
ममता बनर्जीफोटो सोर्स- नवभारत डिजाइन
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TMC Election Commission Decision: विभाजित हो चुकी टीएमसी के मूल चुनाव चिन्ह को फ्रीज कर चुनाव आयोग ने वैसा ही कदम उठाया, जैसा उसने शिवसेना और राष्ट्रवादी कांग्रेस के संबंध में उठाया था। ममता बनर्जी के नेतृत्व वाले गुट को नया चुनाव चिन्ह 'फुटबाल खिलाड़ी' दिया गया जबकि अरूप राय व ऋतब्रत बनर्जी के गुट को लिफाफा चुनाव चिन्ह दिया गया। आयोग के इस निर्णय को ममता बनर्जी अदालत में चुनौती देने जा रही हैं, जबकि उनकी पार्टी के बागियों ने चुनाव आयोग के निर्णय का स्वागत किया है।

बंगाल विधानसभा चुनाव में टीएमसी के हाथों से सत्ता चली गई, तब पार्टी के बागी सांसदों और विधायकों ने अलग पार्टी बना ली और मूल पार्टी के नाम व चुनाव चिन्ह पर दावा किया। टीएमसी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी का कार्यकाल गत वर्ष ही समाप्त हो गया था। लेकिन पार्टी संविधान का आधार लेकर पार्टी संविधान का आधार लेकर ममता बनर्जी ने अगले वर्ष तक पुराने पदाधिकारियों के कायम रहने का दावा किया।

TMC चुनाव चिन्ह पर फैसला

इस मामले पर चुनाव आयोग विचार कर रहा था, तभी मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी के इस्तीफे की वजह से खाली नंदीग्राम विधानसभा सीट पर उपचुनाव में दोनों गुटों के उम्मीदवारों ने टीएमसी के चुनाव चिन्ह पर अपना दावा जताया। इसे देखते हुए चुनाव आयोग को इस संबंध में तत्काल निर्णय लेना आवश्यक हो गया। इसी समय शिवसेना के पार्टी व चुनाव चिन्ह पर हक को लेकर मामला सुप्रीम कोर्ट में नाटकीय मोड़ पर जा पहुंचा है।

इस घटनाक्रम का कुछ न कुछ प्रभाव चुनाव आयोग के टीएमसी संबंधी निर्णय पर भी पड़ सकता है। किसी पार्टी में फूट पड़ने के बाद उसके बारे में अंतिम निर्णय होने तक चुनाव चिन्ह फ्रीज करने के निर्णय पहले भी लिए जा चुके हैं। शिवसेना का नाम व धनुष-बाण चिन्ह एकनाथ शिंदे को तथा एनसीपी की घड़ी अजीत पवार गुट को देने का आयोग का निर्णय विवाद के घेरे में आ सकता है। ऐसा ही निर्णय टीएमसी के संबंध में होने की संभावना थी।

शिवसेना विवाद पर SC का फैसला

शिवसेना के मामले में एक ही गुट को चुनाव चिन्ह देकर उसको लाभ पहुंचाने की बजाय दोनों गुटों को स्वतंत्र चुनाव चिन्ह क्यों नहीं दिए गए? अदालत ने पूछा है कि मतदाता किसी उम्मीदवार को नहीं, बल्कि विचारधारा को मत देता है अथवा अपात्रता की लटकती तलवार वाले जनप्रतिनिधि के संख्याबल को कैसे स्वीकार किया जा सकता है? बंगाल के विधानसभा चुनाव में टीएमसी की पराजय के बाद इस पार्टी को पूरी तरह उखाड़ फेंकने का बीजेपी ने मन बना लिया था। नंदीग्राम में दोनों पार्टियों की प्रतिष्ठा दांव पर लगी थी।

TMC Election Commission Decision
न्यायालय ने कांग्रेस नेता पूनिया के खिलाफ दर्ज एफआईआर को खारिज करने से किया इनकार

वहां टीएमसी प्रत्याशी की नाम वापसी फिर ममता द्वारा कांग्रेस उम्मीदवार को समर्थन देना और कांग्रेस के उस प्रत्याशी को 2007 के हत्या मामले में गिरफ्तार किया जाना किसी फिल्मी पटकथा के समान रहा। किसी पार्टी के विधायकों की संख्या के आधार पर उनके मूल संगठन व संस्थापक को अलग करना संविधान के अनुसार है या नहीं, इस पर सुप्रीम कोर्ट जो निर्णय देगा वह बंगाल ही नहीं, सारे देश के संसदीय लोकतंत्र के लिए महत्वपूर्ण रहेगा।

लेख- चंद्रमोहन द्विवेदी द्वारा

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