नवभारत विशेष: सोचिए, सुप्रीम कोर्ट नहीं होता तो क्या होता !, सब बन जाते संविधान के हिमायती
एक तरफ संविधान और सुप्रीम कोर्ट है तो दूसरी तरफ सीबीआई, ईडी और सरकार है। भ्रष्टाचार के नाम पर चौतरफा छापे डाले जा रहे हैं। काला धन वापस लाने की हुंकार भरी जा रही है।
- Written By: दीपिका पाल
सुप्रीम कोर्ट (सौ. डिजाइन फोटो)
नवभारत डिजिटल डेस्क: देश की राजनीति से लेकर न्यायपालिका और कार्यपालिका तक एक अरसे से संविधान और उसकी शक्ति पर बहस छिड़ी हुई। विपक्ष और सत्ता पक्ष जहां परस्पर संविधान के हिमायती बनते दिख रहे हैं तो वहीं दूसरी और संवैधानिक शक्तियों के बीच जंग छिड़ी हुई है। जिसमें एक तरफ संविधान और सुप्रीम कोर्ट है तो दूसरी तरफ सीबीआई, ईडी और सरकार है। भ्रष्टाचार के नाम पर चौतरफा छापे डाले जा रहे हैं। काला धन वापस लाने की हुंकार भरी जा रही है। अजब यह है कि अब तक छापों में 90 फीसद कार्रवाई कोर्ट में ढेर हुई है। बीते सप्ताह ऐसी ही एक कार्रवाई में सुप्रीम कोर्ट को फिर नाराज होना पड़ा।
तमिलनाडु शराब दुकान लाइसेंस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि प्रवर्तन निदेशालय यानी ईडी ने सारी हदें पार कर दी हैं। जब राज्य सरकार की जांच एजेंसी मामले में कार्रवाई कर रही है तो ईडी को अनावश्यक हस्तक्षेप की जरूरत नहीं है। तमिलनाडु स्टेट मार्केटिंग कारपोरेशन और तमिलनाडु सरकार की याचिका पर सुनवाई करते सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि ईडी देश के संघीय ढांचे का उल्लंघन कर रहा है।
कोर्ट ने ईडी की तमिलनाडु में छापेमारी की कार्रवाई पर रोक लगा दी. मुख्य न्यायाधीश ने टिप्पणी की, व्यक्तियों पर कार्रवाई ठीक है, लेकिन पूरे कार्पोरेशन पर? ईडी अपनी हदें पार कर रहा है. यह पहला अवसर नहीं है जब सुप्रीम कोर्ट केंद्रीय एजेंसियों को उनका दायरा दिखाया हो. सुप्रीम कोर्ट ने 2023 से अब तक भारत सरकार, सीबीआई और ईडी के संबंध में कई महत्वपूर्ण टिप्पणियां कीं, जो मुख्य रूप से इन जांच एजेंसियों की स्वायत्तता, निष्पक्षता, और कार्यप्रणाली पर केंद्रित थीं. कोर्ट ने बार-बार जोर दिया कि सीबीआई और ईडी को स्वतंत्र रूप से काम करना चाहिए और इन्हें केंद्र सरकार के ‘पिंजड़े में बंद तोता’ की तरह नहीं होना चाहिए. ऐसे में यह सवाल उठना लाजिमी है कि अगर सुप्रीम कोर्ट नहीं होता तो क्या होता…!
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सीबीआई पर केंद्र के नियंत्रण पर टिप्पणी
बंगाल सरकार बनाम भारत संघ (मई 2024) सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार के उस दावे को खारिज कर दिया कि उसका सीबीआई पर कोई नियंत्रण नहीं है। कोर्ट ने कहा कि केंद्र ही तय करता है कि किन मामलों में सीबीआई को राज्यों में जांच के लिए भेजा जाए। यह आश्चर्यजनक है कि केंद्र कहता है कि उसका सीबीआई पर नियंत्रण नहीं है। यह टिप्पणी बंगाल सरकार की याचिका के जवाब में थी, जिसमें आरोप लगाया गया था कि केंद्र सीबीआई का दुरुपयोग कर रहा है। कोर्ट ने इस मामले में फैसला सुरक्षित रखा, लेकिन इस टिप्पणी ने सीबीआई की स्वतंत्रता और केंद्र के प्रभाव पर बहस को तेज कर दिया। हालांकि सीबीआई की वैधानिकता पर सवाल पर सुप्रीम कोर्ट में 2013 के गुवाहाटी हाई कोर्ट के फैसले को चुनौती दी गई थी, जिसमें सीबीआई को असंवैधानिक करार दिया गया था। सुप्रीम कोर्ट ने इस पर स्टे दिया, जिससे सीबीआई कार्य कर रही है
दिल्ली शराब घोटाला
- मनीष सिसोदिया और के.कविता की जमानत याचिकाएं (अगस्त 2024) -सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली शराब घोटाला मामले में सीबीआई और ईडी की जांच प्रक्रिया पर कड़ी टिप्पणी की।
- कोर्ट ने कहा कि ये एजेंसियां पिक एंड चूज की नीति अपनाती हैं, जहां वे चुनिंदा गवाहों और आरोपियों पर कार्रवाई करती हैं, जो भेदभावपूर्ण है।
- लंबे समय तक ट्रायल शुरू न होने पर आरोपितों को जेल में रखना उचित नहीं है, क्योंकि हिरासत की अवधि सजा में नहीं बदलनी चाहिए।
- नतीजा, मनीष सिसोदिया और के। कविता को जमानत मिली और कोर्ट ने जांच एजेंसियों को अपनी कार्यप्रणाली में सुधार लाने की चेतावनी दी।
लेख-चंद्रमोहन द्विवेदी के द्वारा
