संपादकीय: क्या थरूर सचमुच राहुल के साथ हैं?

Congress Leadership Shashi Tharoor: शशि थरूर के दावों के बावजूद कांग्रेस का आंतरिक संकट साफ दिखता है। गांधी परिवार का वर्चस्व और असमावेशी नेतृत्व पार्टी के भविष्य पर सवाल खड़े करता है।
Editorial: Is Tharoor really with Rahul?
प्रतीकात्मक तस्वीर ( सोर्स: सोशल मीडिया )
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नवभारत डिजिटल डेस्क: कांग्रेस नेता शशि थरूर चाहे जितना ही दावा करें कि वह दशा और पार्टी नेतृत्व एक साथ हैं और सब कुछ ठीक चल रहा है, लेकिन जो लोग कांग्रेस के आंतरिक माहौल को जानते हैं, वह शायद ही इस पर भरोसा करेंगे। पिछले 1 दशक से ज्यादा समय से पार्टी में जो कुछ चल रहा है वह सारे देश के सामने है।

गांधी परिवार के वर्चस्व और किसी का सुझाव न सुनने की वजह से कितने ही नेताओं ने कांग्रेस छोड़ी जिनमें ज्योतिरादित्य सिंधिया, जितिन प्रसाद, कपिल सिब्बल, गुलाम नबी आजाद, हिमंत बिस्वा सरमा, आचार्य प्रमोद कृष्णन आदि का समावेश है। पार्टी में सामूहिक नेतृत्व को बढ़ावा नहीं दिया जाता फिर शशि थरूर कैसे कह सकते हैं कि यह और पार्टी हाईकमांड समान पेज पर हैं।

यह संभव है कि कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे और राहुल गांधी से भेंट के दौरान थरूर को कुछ महत्व दिया गया होगा और उनसे पार्टी की निर्णय प्रक्रिया में सहभागी होने को कहा गया होगा। फिर भी सवाल उठता है कि क्या पार्टी नेतृत्व अपना पुराना रवैया सुधारकर समावेशी निर्णय प्रक्रिया अपनाना चाहेगा? अभी कुछ ही दिन पहले एक अन्य कांग्रेस नेता शकील अहमद ने पार्टी की बार-बार विफलता के लिए राहुल के नेतृत्व को जिम्मेदार ठहराया था।

विपक्षी गठबंधन 'इंडिया' के अनेक सहयोगी दल भी मानते हैं कि शकील अहमद के आरोप में दम है। राजनीति में अखिलेश यादव व ममता बनर्जी अपने-अपने राज्यों में कांग्रेस या राहुल गांधी को महत्व नहीं देते। इसीलिए इंडिया गठबंधन खोखला बना हुआ है। यह सही है कि कांग्रेस की कर्नाटक, हिमाचल प्रदेश व तेलंगाना राज्यों में सरकारें हैं तथा वह कुछ राज्यों के सत्तारूढ़ गठबंधन में सहभागी है, इतने पर भी पार्टी लोकसभा में 100 सीटों से आगे नहीं जा पाई।

राहुल गांधी 'बोट चोरी' का आरोप लगाकर या अदानी अंबानी की मोदी सरकार से मिलीभगत का शोर मचाकर अपनी राजनीति कर रहे हैं। क्या थरूर ने पूरे दिल से राहुल गांधी पर विश्वास जाहिर किया है? ऐसा लगता है कि पार्टी में अलग-थलग या उपेक्षित होने से बचने के लिए उन्होंने यह कूटनीतिक कदम उठाया है। केरल में थरूर ही पार्टी का चेहरा रहे हैं।

कांग्रेस यदि उनकी उपेक्षा करेगी तो उसे केरल में नुकसान उठाना पड़ेगा, थरूर ने कांग्रेस का लोकतांत्रिक स्वरूप दिखाने के लिए अध्यक्ष पद के उम्मीदवार मल्लिकार्जुन खड़गे के खिलाफ चुनाव लड़ा था लेकिन इसे उनका बगावती रवैया मान लिया गया था। शशि थरूर ने प्रधानमंत्री मोदी के कुछ अच्छे कदमों की सराहना भी की थी, जिसे कांग्रेस ने पसंद नहीं किया था।

तब ऐसा लग रहा था कि यूएन में अंडर सेक्रेटरी तथा मनमोहन सरकार में विदेश विभाग संभाल चुके थरूर पर कांग्रेस नेतृत्व सख्त कार्रवाई कर सकता है। थरूर ने अपना संतुलन नहीं खोया, बल्कि अपने तरीके से पार्टी के प्रति निष्ठा व्यक्त की है।

लेख-चंद्रमोहन द्विवेदी के द्वारा

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