

State Election Officer Controversy: पड़ोसी ने हमसे कहा, 'निशानेबाज, सफलता की सीढ़ी पर चढ़ना हो तो किसी के हो जाओ या किसी को अपना बना लो! आपने गीत सुना होगा 'किसी ने अपना बना के मुझको मुस्कुराना सिखा दिया। कुछ राज्यों के चुनाव आयुक्तों की शानदार सक्सेस स्टोरी आपके सामने है। पाहले उन्होंने राज्य में चुनाव करवाए और नई सरकार आते ही उसमें चीफ सेक्रेटरी या मुख्य सचिव बन बैठे। इस तरह राज्य की पूरी प्रशासनिक मशीनरी के मुखिया हो गए। इसे कहते हैं कर्मफल, बीज बोया, खाद-पानी दिया और फिर फल भी चखा।'
हमने कहा, 'लगता है, आप बंगाल और केरलम की बात कह रहे हैं। बंगाल में बीजेपी को जिताने में राज्य के चुनाव आयुक्त मनोजकुमार आग्रवाल की मुख्य भूमिका रही। जिस प्रकार नाई बालों को कतरता और छोटा करता है, वैसे ही उन्होंने बंगाल की बेढब मतदाता सूची से 92 लाख वोटर के नाम काट दिए, एसआईआर से सारी कसर निकाल दी। इससे शुभेदु सरकार के लिए शुभ घड़ी आई और बीजेपी के विजयरथ ने ममता की टीएमसी को रौंद डाला। इतना बड़ा सहयोग देने का चुनाव आयुक्त को पुरस्कार मिला। भगवा की सेवा करने पर उन्हें राज्य के चीफ सेक्रेटरी का ओहदा मिल गया।"
पड़ोसी ने कहा, 'निशानेबाज, चाहे बीजेपी हो या कांग्रेस दोनों ही एक जैसा काम करती हैं। केरलम में भी राज्य के चुनाव आयुक्त रथन केलकर को कांग्रेस नेतृत्व की यूडीएफ सरकार ने चीफ सेक्रेटरी बना दिया। यह भी इनाम ही है। एक-दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप करने वाली पार्टियों बीजेपी और कांग्रेस की करनी एक जैसी है।'
हमने कहा, 'हमारा चुनाव आयोग टी। एन। शेषन के चीफ इलेक्शन कमिश्नर रहते हुए बेहद पावरफुल हो गया था। स्वतंत्र व निष्पक्ष चुनाव कराने के लिए शेषन की ख्याति थी। वह बिना किसी दबाव या प्रलोभन में आए फ्री एंड फेयर इलेक्शन करवाते थे। बाद में सरकार ने शेषन के पर कतरने के लिए चुनाव आयोग को त्रिसदस्यीय बना दिया था।' पड़ोसी ने कहा, 'निशानेबाज, इस समय स्थिति अलग है। विपक्षी पार्टियां मानती हैं कि चुनाव आयोग सरकार की कठपुतली बन गया है। चुनाव आयुक्तों को इलेक्शन के बाद चीफ सेक्रेटरी बना देने को मिलीभगत माना जा रहा है।'
लेख- चंद्रमोहन द्विवेदी के द्वारा