निशानेबाज: यात्री, एयरलाइन दोनों का कसूर, जाना था दिल्ली, पहुंचा भुवनेश्वर

Air India Flight- एयर इंडिया एक्सप्रेस विमान सेवा में भी कमाल हो गया।श्रीनगर से फ्लाइट में सवार हुए एक यात्री को दिल्ली में उतरना था लेकिन वह ओडिशा के भुवनेश्वर पहुंच गया। इस घटना ने कई सवाल खड़े किए।
आज का निशानेबाज, ओडिशा पहुंचा फ्लाइट का यात्री
आज का निशानेबाज (सौ. डिजाइन फोटो)
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नवभारत डिजिटल डेस्क: पड़ोसी ने हमसे कहा, ‘निशानेबाज, एयर इंडिया एक्सप्रेस विमान सेवा में भी कमाल हो गया।श्रीनगर से फ्लाइट में सवार हुए एक यात्री को दिल्ली में उतरना था लेकिन वह ओडिशा के भुवनेश्वर पहुंच गया.’ हमने कहा, ‘इसी बात को लेकर फिल्म चलती का नाम गाड़ी का गाना था- ‘जाते थे जापान, पहुंच गए चीन, समझ गए ना!’ लोग जमीन पर ही नहीं, आसमान में भी रास्ता भटक जाते हैं।एक अन्य गीत है- मुसाफिर हूं यारो, ना घर है ना ठिकाना, मुझे चलते जाना है, बस यूं ही चलते जाना!’

पड़ोसी ने कहा, ‘निशानेबाज, आप गलत समझ रहे हैं।उस यात्री की मंजिल तय थी।उसने श्रीनगर से दिल्ली का टिकट लिया था।जब बाकी सभी यात्री दिल्ली एयरपोर्ट पर उतर गए तो उसे भी वहां उतर जाना चाहिए था।शायद वह अपनी सीट पर सोता रह गया होगा।वही विमान अगली फ्लाइट से दिल्ली से भुवनेश्वर रवाना हो गया।यात्री को तब होश आया जब वह ओडिशा पहुंच चुका था.’ हमने कहा, ‘ट्रेन में भी ऐसा होता है कि झपकी लग जाने से यात्री को पता ही नहीं चलता कि उसका स्टेशन आ गया।ट्रेन चल पड़ती है तो वह आगे पहुंच जाता है।इसमें गलती यात्री की है।उसे सजग रहना चाहिए।’

पड़ोसी ने कहा, ‘निशानेबाज, ट्रेन की बात अलग है।यहां गलती एयरलाइन की है।उसके कर्मचारियों को दिल्ली में चेक कर लेना चाहिए था कि सारे यात्री विमान से नीचे उतरे हैं या नहीं।इसके बाद अगली फ्लाइट छोड़नी चाहिए थी।यात्रियों के बोर्डिंग पास व लगेज की जांच हो तो ऐसी गलती नहीं हो सकती.’ हमने कहा, ‘बगैर ज्यादा चार्ज दिए उस यात्री को मुफ्त में भुवनेश्वर जाने का मौका मिल गया।अपनी गलती समझने के बाद एयरलाइन उसे वापस दिल्ली ले आई होगी।इस घटना के बाद यात्री को भी अक्ल आ गई होगी कि सही ठिकाने पर उतरना चाहिए नहीं तो ऐसी भूल भुलैया हो जाती है।

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यदि फिर भी उसका दिमाग काम न करे तो वह गा सकता है- मैं राही अनजान राहों का, नाम मेरा अनजाना! जिंदगी में कितने ही लोग अपनी राह भटक जाते हैं।कन्फ्यूजन होने पर वे गाने को मजबूत होते हैं- जाएं तो जाएं कहां, समझेगा कौन यहां दिल की जुबां!’

लेख-चंद्रमोहन द्विवेदी के द्वारा

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