

POK Political Unrest Crisis: पाकिस्तान के अवैध कब्जे वाले कश्मीर में विरोध प्रदर्शनों को कुचलने के लिए पाकिस्तानी सेना और पुलिस ने जिस बर्बरता का सहारा लिया है, उससे यह जन आंदोलन उग्रतर होता जा रहा है। आंदोलनकारियों की मुख्य मांग है कि उन 12 आरक्षित सीटों पर चुनाव न कराए जाएं जो पाकिस्तान में रह रहे शरणार्थियों के नाम पर इस्लामाबाद के कठपुतली शासकों को वहां थोपने के काम आती हैं।
इस्लामाबाद की हुकूमत इसके जरिए हर बार सत्ता पर काबिज होकर पूरे क्षेत्र को पाकिस्तान के बंधक की तर्ज पर व्यवहार करती है। संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद में भारत ने पीओके में बरती जा रही पाकिस्तानी बर्बरता को जोरदार तरीके से उठाया है। भारत का आधिकारिक और संवैधानिक रुख साफ है कि संपूर्ण जम्मू-कश्मीर, जिसमें पाक अधिकृत कश्मीर और गिलगित-बाल्टिस्तान शामिल हैं, वह भारत का अविभाज्य अंग है। प्रधानमंत्री, गृह मंत्री, रक्षा मंत्री, विदेश मंत्री इसे लगातार दोहराते रहे हैं।
भारत में केवल शासक दल ही नहीं सभी राजनीतिक दल पीओके को भारत में मिलाने के लिए एक स्वर से राजी हैं और वे सत्ता के द्वारा ऐसे मामले में किए जाने वाले हर प्रयास के साथ होंगे। पीओके को वापस लेने का सबसे सीधा मार्ग सैन्य कार्रवाई है पर सैन्य रणनीति के धरातल पर यह निर्णय अत्यंत जटिल और दोधारी तलवार है।
इससे जन-धन की हानि और भू-राजनीतिक संकट की पूरी आशंका है। पीओके क्षेत्र ऊबड़-खाबड़ और अशांत पहाड़ी इलाका होने के नाते भारत अनचाहे अंतहीन आतंकवाद और लंबे युद्ध में फंस सकता है। मैदानी इलाकों में आक्रमणकारी और रक्षक सैनिकों का अनुपात सामान्यतः तीन-एक का होता है, परंतु पीओके जैसे अत्यधिक दुर्गम, ऊंचे और अपरिचित पहाड़ी क्षेत्रों में यह अनुपात बदलकर 9 और एक का करना पड़ता है। यदि पहाड़ों में दुश्मन के 100 सैनिक बंकरों में बैठे हैं, तो उन्हें खदेड़ने के लिए भारत को 900 कुशल जवानों की तैनाती करनी होगी। वर्तमान नियंत्रण रेखा पर 3 लाख सैनिक हैं, ऐसे में हमें कम से कम एक लाख अतिरिक्त सैनिक चाहिए, जिन पर 30,000 करोड़ रुपये से अधिक वार्षिक खर्च का बोझ पड़ेगा।
पीओके से लगे शक्सगाम घाटी को 1963 में पाकिस्तान-चीन समझौते के तहत पाक ने चीन को सौंप दिया है, उसने वहां ग्वादर बंदरगाह से गिलगित तक के चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे यानी सीपीईसी पर 65 बिलियन डॉलर से अधिक का निवेश कर रखा है। इसे चीन अपनी रणनीतिक लाइफलाइन मानता है। यदि भारत पीओके पर कोई बड़ा और प्रत्यक्ष सैन्य हमला करता है, तो चीन इसे अपने 'इन्फ्रास्ट्रक्चर' के लिए सीधा खतरा मानते हुए उत्तर-पूर्व लद्दाख या अरुणाचल में भारत के खिलाफ एक नया मोर्चा खोल सकता है। यह एक राजनीतिक जोखिम के साथ सैन्य मुसीबत भी होगी।
एक पूर्णकालिक युद्ध में कूदना भारत की उभरती आर्थिक महाशक्ति वाली छवि और उसकी विकास की रफ्तार के लिए तार्किक कदम नहीं माना जा सकता। फिर संभव है कि कब्जे के लिए की जाने वाली भारत की इस सैन्य कार्रवाई को अंतरराष्ट्रीय समुदाय आक्रामकता मानेगा इससे जी-20, क्वाड वगैरह में भारत को वैश्विक छवि को ठेस पहुंचे। सैन्य मोर्चे पर सीधे-सीधे बड़े आक्रमण के बजाय भारत इस स्थिति में हाइब्रिड और 'सलामी स्लाइसिंग' की सुक्ष्म रणनीति अपना सकता है।
इसके तहत, खुफिया सूचनाओं और उपग्रहीय डाटा के सटीक उपयोग से नियंत्रण रेखा के पार सक्रिय आतंकी शिविरों और लॉन्च पैड को हवाई हमलों और पिन-पॉइंट ऑपरेशंस के माध्यम से नष्ट किया जाए। इससे पाकिस्तान की सैन्य स्थिति और उसके प्रॉक्सी नेटवर्क की कमर टूट जाएगी।
अगर भारत पीओके को अपने में मिला भी ले, तो पहले जम्मू-कश्मीर का बजट बढ़ाना पड़ेगा और खुद वैश्विक मंदी और महंगाई से जूझ रहे भारत को उसकी बुनियादी सुविधाओं पर भारी निवेश करना होगा। 99 फीसदी मुस्लिम आबादी वाले पीओके से निकले लोग भारतीय नागरिकता पाकर कामकाजी शहरों में फैले, तो वहां डेमोग्राफिक बैलेंस बिगाड़ सकते हैं। राष्ट्रहित में इस समय 'ठंडे दिमाग और अचूक रणनीति' से आगे बढ़ने की आवश्यकता है।
गुलाम कश्मीर या पीओके में उथल-पुथल अब पाकिस्तान के नियंत्रण से बाहर होती जा रही है। वहां के लोग अब पाकिस्तान के बंधक नहीं रहना चाहते, बेशक, पीओके के लोग भारत को बेहतर मानते हैं, उसके समर्थक हैं पर गुलाम कश्मीर परेशान होकर खुद भारत में विलय कर जाएगा, ऐसा सोचना दिवास्वप्न होगा। पीओके को हमेशा देश का अविभाज्य अंग मानने वाला भारत इस अवसर का क्या करे ?
लेख-संजय श्रीवास्तव के द्वारा