निशानेबाज: वृक्ष से हुई नोटो की बरसात, इसके पीछे बंदर का हाथ
'किसी पर्यटन स्थल या तीर्थस्थान पर बंदरों से हमेशा सावधान रहना चाहिए। लोग प्रसाद खरीद कर आगे बढ़ते हैं लेकिन मंदिर तक पहुंचने के पहले ही बंदर लपककर छीन लेता है।
- Written By: आंचल लोखंडे
वृक्ष से हुई नोटो की बरसात, इसके पीछे बंदर का हाथ (सौजन्यः सोशल मीडिया)
नवभारत डिजिटल डेस्क: पड़ोसी ने हमसे कहा, ‘निशानेबाज, अचानक 500 रुपए वाले नोटों की बारिश होने लगे तो आपको कैसा महसूस होगा? तमिलनाडु के कोडईकनाल की गुना केव के पास ऐसा ही हुआ।उ न गुफाओं को देखने गए पर्यटकों पर एक वृक्ष से नोटों की बरसात होने लगी। लोगों ने जमकर नोट बटोरे। हुआ यूं कि एक पर्यटक के बड़े से बैग में नोटों के ढेर सारे बंडल थे। वहां एक बड़ा सा बंदर आया जिसे लगा कि बैग में कुछ खाने की चीजें होंगी। वह झपट्टा मारकर बैग ले भागा और झाड़ पर चढ़ गया। वहां से बैग खोलकर नोट बरसाने लगा और नीचे लोगों में नोट लूटने-बटोरने की आपाधापी मच गई।
मुफ्त का माल दिखा तो चले अपनी जेब भरने!’ हमने कहा, ‘किसी पर्यटन स्थल या तीर्थस्थान पर बंदरों से हमेशा सावधान रहना चाहिए। लोग प्रसाद खरीद कर आगे बढ़ते हैं लेकिन मंदिर तक पहुंचने के पहले ही बंदर लपककर छीन लेता है। खास बात यह है कि प्रसाद बेचनेवालों को बंदर कोई नुकसान नहीं पहुंचाते। या तो वह उसके डंडे से डरते हैं या मानकर चलते हैं कि यह जब प्रसाद बेचेगा तभी तो ग्राहक से छीनने का मौका मिलेगा।’ पड़ोसी ने कहा, ‘बंदर के लिए नोट किस काम के ! इसलिए उसने नीचे फेंकना शुरू कर दिया।
नोट की कीमत इंसान जानता है इसलिए सारी जिंदगी नोटों के पीछे भागता है। कहावत है-बंदर क्या जाने अदरक का स्वाद! एक व्यक्ति ने बंदर पाल रखा था जो उसकी सेवा करता था। वह व्यक्ति सोया हुआ था तब एक मक्खी बार-बार उसकी नाक पर बैठने लगी। बंदर से देखा नहीं गया। उसने बार-बार मक्खी को भगाया लेकिन वह फिर उसके मालिक पर आकर बैठ जाती थी। पास में तलवार पड़ी थी। बंदर ने आव देखा ना ताव मक्खी पर तलवार चला दी इससे मक्खी तो बच गई लेकिन मालिक की नाक कट गई।
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इसलिए बंदर के हाथ में तलवार नहीं देनी चाहिए।जो अयोग्य है वह सारा काम बिगाड़ देता है और नुकसान पहुंचाता है।’ हमने कहा, ‘बंदर चालाक भी होता है। आपने 2 बिल्लियों की कहानी सुनी होगी जो एक रोटी के लिए आपस में लड़ रही थी। बंदर ने कहा कि मैं तुम्हारा फैसला कर देता हूं और आधी-आधी रोटी बांट देता हूं। रोटी को बांटने के नाम पर वह खुद ही खा गया। आज भी नेता और अफसर जनता के पैसे की आपस में बंदरबांट कर लिया करते हैं व पब्लिक तरसती रह जाती है।’
लेख- चंद्रमोहन द्विवेदी के द्वारा
