

Nepal Glacier Flood Devastation: ग्लेशियर के ध्वस्त होने से चीन से लगे नेपाल के सीमावर्ती क्षेत्र में अत्यधिक तेज वेग से पानी, बर्फ, रॉक व मिट्टी की भयावह बाढ़ आ गई। इस बाढ़ से त्रिशूली नदी के आसपास बसे गांव के गांव साफ हो गए। इस बार मौत ने आने से पहले दस्तक नहीं दी। आधिकारिक तौर पर फिलहाल मृतकों की संख्या 1204 बतायी गई है और लापता की तादाद 5,000 के करीब है।
अब नष्ट हो चुके हाइड्रोपॉवर प्रोजेक्ट्स में जो लगभग 100 श्रमिक काम कर रहे थे उनको रेस्क्यू करने का प्रयास जारी है। सबसे बड़ी समस्या मृतकों की शिनाख्त को लेकर है, जिनमें से कुछ के तो सिर्फ शरीर के अंग ही मिल सके हैं। मृतकों के शवों की तस्वीरें अस्पताल की दीवारों पर लगाई गई हैं, जिनके परिजन लापता हैं, उनसे उनका रक्त सैंपल लिया जा रहा है व लापता की दो पासपोर्ट साइज फोटो भी।
यह सब डीएनए के जरिये पहचान करने के उद्देश्य से किया जा रहा है। नेपाल की लापता सूची में 592 विदेशी नागरिक भी हैं, जिनका संबंध भारत, अमेरिका, ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया व कनाडा से है। ये लोग पर्यटक थे, जो माउंटेन ट्रेकिंग के लिए आये थे या तीर्थयात्री थे, जो तिब्बत के पवित्र कैलाश पर्वत में आध्यात्मिक शांति के लिए आये थे। इनके विदेशी रिश्तेदारों से आग्रह किया गया है कि वह अधिकृत लैब में अपना डीएनए प्रोफाइलिंग कराएं और 'डीएनए प्रोफाइल की सॉफ्ट कॉपी नेपाल पुलिस के ई-मेल पते पर भेज दें।
कुछ बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों में सैंकड़ों शवों को सामूहिक दफना दिया गया है, जिनकी पहचान नहीं हो पाई थी; क्योंकि अस्पतालों या मुर्दाघरों में जगह नहीं बची थी और शव सड़ने लगे थे। इन शवों का डीएनए सैंपल ले लिया गया था। भारतीय फोरेंसिक टीम के 19 सदस्य अन्य फोरेंसिक विशेषज्ञों के साथ डीएनए सैंपलों का विश्लेषण कर रहे हैं। भारतीय टीम काठमांडू घाटी के खुमाल्टर क्षेत्र में स्थित नेपाल पुलिस सेंट्रल फोरेंसिक साइंस लेबोरेटरी और नेशनल फोरेंसिक साइंस लेबोरेटरी में कार्य कर रही है।
बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों से जो डीएनए सैंपल एकत्र किये गए हैं, उनकी प्रोसेसिंग में तेजी लाने व पीड़ितों व लापता व्यक्तियों की पहचान स्थापित करने के लिए भारतीय टीम, नेपाल व चीन विशेषज्ञों के साथ मिलकर काम कर रही है। नेपाल पुलिस का कहना है कि अभी तक जो शव बरामद हुए हैं, उनमें से 400 के तो सिर्फ शरीर के कुछ अंश ही मिले हैं, जिससे पहचान प्रक्रिया जटिल हो गई है। भविष्य में पहचान हेतु 'लावारिस' शवों के भी डीएनए सैंपल एकत्र किये गए हैं। अब तक सबसे अधिक शव चितवन जिले से मिले हैं। डीएनए सैंपल एकत्र करने के बाद सैंकड़ों शवों को नदी के किनारे खुली जगहों पर दफना दिया गया है।
लापता व्यक्तियों के मिलने की संभावना अब लगभग शून्य हो गई है। शायद यही वजह है कि नेपाल सरकार ने अपना फोकस बचाव (रेस्क्यू) से हटाकर अब राहत व पुनर्वास की ओर कर दिया है। लेकिन खोजी टीमें हाइड्रोपॉवर टनलों में खुदाई जारी रखे हुए हैं, इस उम्मीद में कि शायद श्रमिक चैम्बरों या एयर पॉकेट्स में अभी भी जिंदा हों। भारतीय उपमहाद्वीप में प्राकृतिक आपदाएं आती रहती हैं, जिनमें मौतें भी होती हैं और मृतकों की शिनाख्त करना अक्सर कठिन हो जाता है।
भविष्य में नेपाल जैसी स्थिति से बचने का कोई तो उपाय भारत में किया जाना चाहिए ताकि प्राकृतिक आपदाओं में पीड़ितों की पहचान करने में कोई दिक्कत न हो। भारत में फिलहाल अपराधियों का डीएनए प्रोफाइल रिकॉर्ड तो रखा जाता है, लेकिन सभी नागरिकों के डीएनए प्रोफाइल रिकॉर्ड रखने का विरोध है, निजता के अधिकार (अनुच्छेद 21) का उल्लंघन, आशंकित दुरूपयोग आदि को लेकर। यह चिंताएं उचित हैं, लेकिन कोई तो रास्ता हो जिससे पीड़ितों का परिवार अनिश्चितता की स्थिति में न रहे।
भारत में फिलहाल अपराधियों का डीएनए प्रोफाइल रिकॉर्ड तो रखा जाता है, लेकिन सभी नागरिकों के डीएनए प्रोफाइल रिकॉर्ड रखने का विरोध है, निजता के अधिकार (अनुच्छेद 21) का उल्लंघन, आशंकित दुरूपयोग आदि को लेकर। यह चिंताएं उचित हैं, लेकिन कोई तो रास्ता हो जिससे पीड़ितों का परिवार अनिश्चितता की स्थिति में न रहे।
लेख- नरेंद्र शर्मा के द्वारा