Top Maoist Leader Surrenders ( सोर्स: सोशल मीडिया )
Top Maoist Leader Surrenders: केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने मार्च माह के अंत तक नक्सलवाद को पूरी तरह खत्म करने की घोषणा की थी जिसका असर होता दिखाई दे रहा है। अक्टूबर में भूपति उर्फ मल्लोजुला वेणुगोपाल ने अपने 60 साथियों सहित मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस के सामने आत्मसमर्पण किया।
इसके पहले भूपति की पत्नी तारक्का और किशनजी की पत्नी सुजाता ने सरेंडर किया था। सुरक्षा बलों के बढ़ते दबाव की वजह से कुख्यात नक्सली नेता देवजी ने समर्पण कर दिया, जिसे पकड़ने पर 10 करोड़ रुपये का इनाम था।
2007 में रानी बोदली कैंप पर हमले में 55 पुलिस कर्मियों की और 2010 में ताडमेटला हमले में केंद्रीय रिजर्व बल के 76 जवानों की बलि लेने वाले देवजी का हथियार डाल देना एक बड़ी उपलब्धि है।
2013 में जीरम घाटी में हमला कर विद्याचरण शुक्ल, नंदकुमार साय व अन्य कांग्रेस नेताओं की हत्या के आरोपी देवजी ने पूर्व मंत्री धर्मराव बावा आत्राम का 1991 में अपहरण किया था व 17 दिन बंधक बनाकर रखा था। तब तत्कालीन मुख्यमंत्री शरद पवार को आत्राम की रिहाई के लिए प्रयास करने पड़े थे।
तेलंगाना में मल्लाराजू रेड्डी उर्फ संग्राम ने भी 14 नक्सलियों के साथ आत्मसमर्पण कर दिया। नक्सली आंदोलन की कमर टूट रही है। अब तेलंगाना, महाराष्ट्र और छत्तीसगढ़ में एम। लक्ष्मणराव उर्फ गणपति तथा झारखंड में मिशीर बेसरा उर्फ सागर जैसे 2 बड़े नक्सली नेता रह गए हैं। यदि उन्होंने सरेंडर नहीं किया तो उनका सफाया होकर रहेगा।
वैचारिक संघर्ष के नाम पर आदिवासियों की बलि लेने वाले नक्सली देश के लिए नासूर बने हुए थे। कानून और संविधान को नहीं मानने वाले ये दरिंदे किसी भी आदिवासी को पुलिस का मुखबिर होने के संदेह में सार्वजनिक रूप से यातना देकर मार डालते थे।
नक्सलियों का अंत तो हो जाएगा लेकिन जिन पिछड़े हुए इलाकों में इनका आतंक रहा है, वहां तेजी से विकास के लिए सरकार को ब्लूप्रिंट बनाना होगा। हिंसाचार से पीड़ित जनता को मुख्य प्रवाह में लाने की ठोस योजना बनानी होगी।
नक्सली प्रभाव के क्षेत्रों में अपार खनिज संपदा है। वहां खनिकर्म शुरू कर लोगों को रोजगार देना होगा, यदि लोगों को विस्थापित किया तो एक नया असंतोष जन्म ले सकता है। इसलिए सरकार को जनभावना समझनी होगी व उनके अनुरूप कदम उठाने होंगे।
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वहां शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार व यातायात के साधनों की समुचित व्यवस्था करनी होगी। लोगों को लोकतांत्रिक अधिकार व अवसर देने होंगे जिससे उन्हें नक्सलियों ने वंचित कर रखा था।
नक्सलवाद के नेटवर्क व हथियारों की सप्लाई पर भी अंकुश लगाना होगा। यह देखना होगा कि नक्सली फिर से एकजुट न हो जाएं। अर्बन नक्सलियों से भी निपटना होगा जो सफेदपोश होने से नजर नहीं आते, लेकिन उनकी घुसपैठ अनेक क्षेत्रों में है।
लेख- चंद्रमोहन द्विवेदी के द्वारा