

Maharashtra Farmers Relief Package: महाराष्ट्र में सूखा स्थिति इतनी गंभीर और चिंताजनक है कि मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने इसकी तीव्रता की तुलना 1972 के दुष्काल से की है। इस समय राज्य की 358 में से 265 तहसीलों में 'ट्रिगर वन' के हालात हैं। 2016 में सूखा व्यवस्थापन संहिता लागू की गई जिसके अनुसार वर्षा 75 प्रतिशत कम होने तथा लगातार 21 दिनों का अंतर पड़ने पर ट्रिगर वन स्थिति मानी जाती है। इसके पहले 2018 में 151 तथा 2023 में 40 तहसीलों में ट्रिगर वन घोषित किया गया था।
इसके मानदंडों के अनुसार भू-राजस्व में छूट, फसल कर्ज का पुनर्गठन, कर्जवसूली स्थगित करना, छात्रों के परीक्षा शुल्क की माफी तथा रोजगार गारंटी के काम की शर्तों को शिथिल करना, खाद्यान्न व चारे की उपलब्धता तथा जलसंधारण के कामों का समावेश है।
1972 की तुलना में स्थिति कुछ अलग है, क्योंकि केंद्र के गोदामों में 900 लाख टन का अन्न भंडार मौजूद है। यातायात की सुविधा तथा लाभार्थी के खाते में पैसे भेजने की डिजिटल पेमेंट प्रणाली भी उपलब्ध है। इस बार पेयजल की समस्या गंभीर है। लोगों तथा पशुओं के लिए गांव-गांव पीने का पानी पहुंचाना चुनौतीपूर्ण है। वर्षा के अभाव में खरीफ की फसल सूख गई है। बांधों में पानी कम रहने से रबी की बागायती फसल में भी भारी कमी आने का अनुमान है। फसल का नुकसान होने पर किसान दूध बेचकर गुजर-बसर कर लेते हैं, इसलिए पशुधन की चिंता करना भी आवश्यक है।
महाराष्ट्र सरकार ने गत वर्ष राज्य के अतिवृष्टि ग्रस्त किसानों को लगभग 32,000 करोड़ रुपये की मदद दी थी। कर्जमाफी के लिए 36,000 करोड़ रुपये की जरूरत है। विपक्ष का आरोप है कि ताजी घोषणा में किसानों की मदद के संबंध में कोई ठोस योजना पेश नहीं की गई। 'लाडकी बहिन योजना' जैसी योजना गरीबों को कितना आधार दे पाएगी, यह भी एक प्रश्न है।
केंद्र सरकार की मदद मिले बिना सभी उपाय अपर्याप्त रहेंगे। केंद्र सरकार ने चालू आर्थिक वर्ष में महाराष्ट्र को 1 लाख 20 हजार करोड़ रुपये तक कर्ज लेने की अनुमति दी है। केंद्र के मानदंडों के अनुसार मानसून की पूरी तरह वापसी हो जाने के बाद मूल्यांकन की प्रक्रिया शुरू होगी। इस शर्त में नरमी बरती जानी चाहिए।
किसानों व ग्रामीणों को राहत देने में सरकारी योजना से ही काम नहीं चलेगा। स्वयंसेवी संस्थाओं, बड़े मंदिरों व दानदाताओं को इस संकटकाल में आगे आकर मदद का हाथ बढ़ाना होगा। सूखे की वजह से महंगाई व जमाखोरी और बढ़ सकती है। ग्रामीण क्षेत्रों से शहर की ओर पलायन भी तेज हो सकता है। यह सारी चुनौतियां राज्य के सामने हैं।
लेख- चंद्रमोहन द्विवेदी के द्वारा