नवभारत निशानेबाज: Hindi विरोध की घातक राजनीति, कब आएगी नेताओं को सन्मति

Tamil Nadu Hindi Opposition: एम. के. स्टालिन ने हिंदी थोपने के आरोप लगाते हुए विरोध जताया, वहीं त्रिभाषा फॉर्मूले को बहुभाषी शिक्षा व रोजगार के लिए उपयोगी बताया जा रहा है।
Navbharat Nishanebaaz: The Deadly Politics of Protest—When Will Leaders Acquire Wisdom?
नवभारत डिजाइन फोटो
Updated on

Stalin Hindi Policy Debate: पड़ोसी ने हमसे कहा, 'निशानेबाज, तमिलनाडु के मुख्यमंत्री व डीएमके प्रमुख एम। के। स्टालिन फिर हिंदी विरोध पर उत्तर आए हैं। उन्होंने कहा कि केंद्र सरकार नाई शिक्षा नीति के तहत सीबीएसई स्कूलों में हिंदी लाद रही है। त्रिभाषा फार्मूले से गैर हिंदी भाषी राज्यों में हिंदी अनिवार्य कर दी जाएगी। 2026-27 के शिक्षा सत्र में छठी कक्षा से हिंदी पढ़ाए जाने का उन्होंने तीव्र विरोध किया है।'

हमने कहा, 'राष्ट्रीय स्तर पर संपर्क, संवाद, रोजगार, व्यापार व नौकरियों के लिए हिंदी सीखनी ही चाहिए, त्रिभाषा फॉर्मूला इसके लिए अवसर प्रदान कर रहा है। बच्चों में ग्रहण शक्ति अच्छी होती है। वह जल्दी ही हिंदी सीख लेंगे। उन्हें अपनी मातृभाषा तमिल और अंग्रेजी के साथ हिंदी भी आ जाएगी। व्यक्ति का बहुभाषी होना बहुत अच्छी बात है। यदि आप यूरोप घूमने जाएं तो वहां अंग्रेजी के अलावा फ्रेंच और जर्मन जानना भी बहुत उपयोगी होता है। हिंदी कठिन नहीं है। दक्षिण भारत के आईएएस और आईपीएस अधिकारी जहां पोस्टिंग हो, वहां की भाषा अच्छी तरह बोलना सीख लेते हैं।'

पड़ोसी ने कहा, 'निशानेबाज, आप राजनीति में घुसे भाषावाद को समझिए, मनसे नेता राज ठाकरे भी तो हिंदी विरोधी हैं। परप्रांतीयों की पिटाई से उन्होंने अपनी राजनीति चमकाई थी। महाराष्ट्र में भी परिवहन मंत्री प्रताप सरनाईक ने आरटीओ को निर्देश दिया है कि जिन ऑटोरिक्शा चालकों को मराठी बोलना नहीं आता, उनके परमिट छीन लिए जाएं। महाराष्ट्र में ऑटो चलाना है तो यात्रियों से मराठी में बात करनी होगी। यह क्षेत्रीय अस्मिता का सवाल है।'

हमने कहा, 'हिंदी भारतमाता के माथे की बिंदी है। इसे प्रेम से अपनाना सभी का कर्तव्य है। हमारी सेना के हर जवान की हिंदी आती है। वैजयंतीमाला, हेमा मालिनी, श्रीदेवी, रेखा तमिलनाडु की थीं लेकिन यह सभी हिंदी फिल्मों की लोकप्रिय हीरोइनें बनीं। यहां तक कि जयललिता ने भी धर्मेंद्र के साथ फिल्म 'इज्जत' में काम किया था। बाद में वह तमिलनाडु की मुख्यमंत्री बनीं। यदि लोग सिर्फ अपने राज्य की भाषा जानने तक सीमित रहेंगे तो कुएं के मेंढ़क या कूपमंडूक बनकर रह जाएंगे। हिंदी विरोध की राजनीति राष्ट्र के लिए नुकसानदेह है।'

लेख- चंद्रमोहन द्विवेदी के द्वारा

Navbharat Live
navbharatlive.com