

India Integrated Air Defense: जिस मिशन सुदर्शन चक्र को भारत के अपने हाईटेक एयर डिफेंस अंब्रेला के तौर पर देखा जा रहा है, जो दुश्मन की मिसाइलों, ड्रोन और एयरक्राफ्ट को गंभीर खतरा पैदा करने से पहले ही खत्म कर देगा, ऐसे महत्वपूर्ण मिशन के प्रति इतना दीलापन क्यों? इसके लिए कई तरह के रडारों की स्थापना और 52 से ज्यादा उपग्रहों के प्रक्षेपण के साथ स्वदेशी वायु रक्षा प्रणाली कुशा एवं रूसी एयर डिफेंस सिस्टम एस 400 के साथ इसके इंट्रीग्रेशन के अलावा कुछ अन्य तकनीकी व्यवस्था और प्रबंध करने की प्रगति धीमी क्यों है? 52 उपग्रहों में एक भी लॉन्च क्यों नहीं हुआ? मिशन सुदर्शन चक्र का आधार है स्पेस एयर डिफेंस कमांड।
यह थियेटर कमांड कब तक तैयार होगा? 15 अगस्त 2025 को दूरदर्शी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा चोषित 'मिशन सुदर्शन चक्र' ने भारतीय सुरक्षा चिंतन में एक बड़े मोड़ का संकेत दिया। लक्ष्य है ऐसा बहु-स्तरीय, स्वदेशी, एकीकृत वायु एवं मिसाइल-रक्षा तंत्र खड़ा करना, जो न केवल सैन्य ठिकानों बल्कि रणनीतिक परिसंपत्तियों, नागरिक बुनियादी ढांचे और राष्ट्रीय कमांड नेटवर्क को भी सुरक्षित कर सके। सुदर्शन चक' एक अकेला सिस्टम नहीं, 'सिस्टम ऑफ सिस्टम्स है।
इसमें लंबी दूरी की सतह से वायु मिसाइलें, रडार नेटवर्क, कमान एवं नियंत्रण, काउंटर यूएएस, इलेक्ट्रॉनिक युद्ध, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, अंतरिक्ष-आधारित निगरानी और संभवतः भविष्य में स्पेस-कमांड तथा साइबर कमांड जैसी संस्थागत संरचनाएं शामिल होंगी। बड़ी रक्षा परियोजनाएं पहले नीति, फिर स्वीकृति, तब परीक्षण, उसके बाद उत्पादन और अंततः संयुक्त तैनाती के चरणों में ही आगे बढ़ती हैं।
52 निगरानी उपाहों में से 21 इसरो और 31 निजी कंपनियां विकसित करने की मंजूरी है। पूरी श्रृंखला 2029 तक लॉन्च करने का लक्ष्य है। अब 52 उपग्रहों को एक के बाद एक रवाना किया जा सके ऐसा नहीं है। उपग्रहों के पेलोड, कक्षा, ग्राउंड सेगमेंट, डाटा-प्रोसेसिंग और सैन्य-इंटीग्रेशन की पूरी श्रृंखला व्यवहारिक रूप से सघन तालमेल मांगती है, इसलिए इसमें भी विलंब स्वाभाविक है।
प्रोजेक्ट कुशा को डीआरडीओ लंबी दूरी के स्वदेशी सतह से वायु मिसाइल डिफेंस स्सिस्टम के रूप में विकसित कर रहा है। यह भविष्य में एस-400 जैसी विदेशी प्रणाली पर निर्भरता घटाएगा, मिशन के तहत पूरे देश में रडारों का एक ऐसा जाल बनाना है, जो इतना घना हो कि इसकी नजर में आए कोई भी दुश्मन मिसाइल या ड्रोन निकल न सके।
मिशन सुदर्शन चक्र की पूर्णता के लिए सर्वाधिक महत्वपूर्ण है स्पेस और एयर कमांड का जल्दी बनना। एकीकृत डिफेंस प्रोग्राम जिसका लक्ष्य बल, जल और नभ की ताकतों को 'स्पेस-आधारित डाटा' से जोड़ना है। आज देश के पास इसके लिए आवश्यक कुछ संस्थागत ढांचे पहले से मौजूद हैं, जैसे डिफेंस स्पेस एजेंसी, एकीकृत सैन्य कार्यवल, वगैरह लेकिन 'पूर्ण विकसित' स्पेस कमांड अभी एक अवधारणा से आगे बढ़कर भिन्न ऑपरेशनल कमांड नहीं बना है। यही बात साइबर कमांड पर भी लागू होती है।
बिना इन कमानों के डाटा-फ्यूजन, सेंसर-शेयरिंग और तेज निर्णय-चक्र सीमित रहेंगे। इसलिए सुदर्शन चक्र की सफलता का सबसे बड़ा कमान-एकीकरण होगा। क्योंकि आधुनिक युद्ध में समय की बचत ही सुरक्षा की असली परिभाषा है। सुदर्शन चक्र परियोजना की सबसे बड़ी सीमा तकनीक नहीं, समय और औद्योगिक स्केल है।
हमने रक्षा उत्पादन और निर्यात में उल्लेखनीय वृद्धि की है, लेकिन बड़े 'सिस्टम ऑफ सिस्टम्स' जैसे कार्यक्रमों में गुणवत्ता, मानकीकरण और समय पालन कहीं अधिक कठिन होता है। डीआरडीओ, इसरो, वायुसेना, आएडीएस, निजी अंतरिक्ष कंपनियां और बीईएल जैसी एजेंसियां अगर अलग-अलग गति से चलेंगी तो देरी स्वाभाविक है।
कुशा परियोजना, काउंटर ड्रोन, रडार घनत्व, स्पेस बेस्ड सर्विलांस और कमांड इंटीग्रेशन, ये सब साथ में चलेंगे, निरंतर वित्त पोषण, स्वदेशी विकास की तीव्र समय सीमा, तीनों सेनाओं का गहन एकीकरण और निजी क्षेत्र की अधिक भागीदारी भरपूर होगी तो सुदर्शन चक्र' देर सवेर अवश्य आकार लेगा।
सुदर्शन चक्र को भारत का आयरन डोम कहना ठीक नहीं। यह उससे कहीं आगे की तकनीक है, जिसमें इजराइली गोल्डन डोम तथा रूसी तुंद्रा की तरह मिली-जुली खासियतें होंगी। यह ढाल और तलवार की तरह बचाव और हमला दोनों काम करेगा।
लेख- संजय श्रीवास्तव के द्वारा