नवभारत संपादकीय: ओबीसी आरक्षण के बीच पंचायत चुनाव की तैयारी, क्या समय पर मतदान करा पाएगी सरकार?

Maharashtra Zilla Parishad Elections: सुप्रीम कोर्ट के आदेश से महाराष्ट्र की 20 जिला परिषदों व 225 पंचायत समितियों के चुनाव का रास्ता खुला है। OBC आरक्षण व राजनीतिक चुनौतियों के बीच अब सरकार के सामने।
OBC Reservation and Maharashtra Panchayat Elections
सुप्रीम कोर्टफोटो सोर्स- नवभारत डिजाइन
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Highlights

  • सुप्रीम कोर्ट ने महाराष्ट्र की 20 जिला परिषदों और 225 पंचायत समितियों के चुनाव कराने का आदेश दिया है।

  • ओबीसी आरक्षण और 50% की सीमा को लेकर चुनाव प्रक्रिया में जटिलता बनी हुई है।

  • चुनाव में देरी से ग्रामीण विकास कार्यों और सरकारी निधि के वितरण पर असर पड़ा है।

  • अब राज्य सरकार और चुनाव आयोग के सामने जल्द चुनाव कराने की चुनौती है।

OBC Reservation and Maharashtra Panchayat Elections: लंबे समय से प्रशासक के अधीन रही राज्य की ग्रामीण स्वराज्य संस्थाओं के चुनाव का मार्ग अब प्रशस्त हो गया है। विलंब से ही सही, सुप्रीम कोर्ट ने महाराष्ट्र की शेष 20 जिला परिषदों तथा 225 पंचायत समितियों के चुनाव अन्य पिछड़ेवर्गीयों के आरक्षण सहित कराने का आदेश दिया है। इससे राज्य की राजनीति को गति मिलेगी।

कुछ महीने पूर्व राज्य की 12 जिला परिषदों के चुनाव न्यायालय के आदेशानुसार कराए गए थे लेकिन बची हुई जिला परिषदों में प्रशासक का 5 वर्ष का कार्यकाल पूर्ण होता आया है। इसलिए चुनाव का मुहूर्त आया है। वास्तव में ओबीसी आरक्षण का विवाद तथा निर्णय टलते रहने से चुनाव अटके हुए थे। कुछ संस्थाओं में आरक्षण की सीमा 60 से 70 प्रतिशत तक चले जाने की वजह से जटिलता बढ़ गई थी।

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पंचायत चुनाव पर सस्पेंस कायम

अब सुप्रीम कोर्ट ने पहले की प्रक्रिया के अनुसार ही चुनाव कराने का आदेश चुनाव आयोग को दिया है। परंतु ओबीसी को कितना आरक्षण दिया जाए, इस चारे में निर्णय नहीं हुआ है। चुनाव हो भी जाए तो अदालत के अंतिम फैसले की तलवार सिर पर लटकी रहेगी। जिन संस्थाओं में आरक्षण की मर्यादा 50 प्रतिशत से कम है वहां चुनाव कार्यक्रम तत्काल घोषित किया जा सकता है परंतु जहां आरक्षण सीमा पार कर ली गई है वहां प्रभाग रचना और आरक्षण नए सिरे से तय करना होगा।

अब मुद्दा यह है कि क्या विधान परिषद चुनाव के नतीजे मनोनकूल नहीं आने, सूखा स्थिति, एसआईआर से पनपा असंतोष, जेन-जी का आंदोलन तथा मनोज जररांग के 500 करोड़ रुपए के आडियो प्रकरण को लेकर हो रहे आरोप प्रत्यारोप के बीच सरकार जिला परिषद व पंचायत चुनाव कराने की हिम्मत दिखा पाएगी? हो सकता है कि सुखा स्थिति का हवाला देते हुए सरकार चुनाव आयोग से फिलहाल चुनाव टालने का विशेष अनुरोध करे। वर्तमान स्थिति में महाबुति की बीजेपी, शिक्सेना (शिंद) व राकांपा को चुनाव आसान नहीं लग रहा है।

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ग्रामीण लोकतंत्र के लिए चुनाव जरूरी

यद्यपि विधान परिषद चुनाव के नतीजों की वजह से महाविकास आघाडी के हौसले बुलंद हैं लेकिन फिर भी उसके सामने ग्रामीण क्षेत्रों में संगठन मजबूत करने की चुनौती है। नौकरशाही की वजह से स्थानीय स्वराज्य संस्थाओं को भुला दिया गया है। जबकि ग्रामीण क्षेत्रों में अंतिम घटक तक सरकारी योजनाएं पहुंचाने का काम जिला परिषद व पंचायत करती हैं। प्रशासकीय राज में इन संस्थाओं व ग्रामीण जनता का काफी अधिक नुकसान हुआ है।

समय पर चुनाव नहीं होने के कारण वित्त आयोग की ओर से सैकड़ों करोड़ रुपए पंचायत राज व्यवस्था को उपलब्ध नहीं हो पाए, जिला परिषद, पंचायत समिति व ग्राम पंचायत में जनप्रतिनिधित्व रुक जाने से निधि का वितरण व उपयोग, विकास कार्यों की प्राथमिकता तथा जनता की प्रत्यक्ष सहभागिता सभी पर विपरीत प्रभाव पड़ता है। प्रशासकीय तंत्र की वजह से यह संस्थाएं कमजोर हो गई हैं। उन्हें फिर से सक्षम बनाना है तो न्यायालयीन निर्देश के अनुसार जिला परिषद व पंचायत के चुनाव शीघ्र कराने की जिम्मेदारी राज्य सरकार व चुनाव आयोग को निभानी होगी। यह लोकतंत्र के बुनियादी हित में आवश्यक है।

लेख- चंद्रमोहन द्विवेदी के द्वारा