

एसआईआर प्रक्रिया और चुनाव आयोग की कार्यशैली को लेकर सुप्रीम कोर्ट में कानूनी जांच जारी है।
करीब 13 करोड़ मतदाताओं के नाम हटाए जाने और आयोग के फैसलों पर सवाल उठे हैं।
फॉर्म-6 के साथ अतिरिक्त घोषणा पत्र जोड़ने और उसके कानूनी अधिकार पर विवाद है।
मुख्य चुनाव आयुक्त के एकतरफा फैसले लेने के अधिकार और अन्य आयुक्तों की आपत्तियां भी चर्चा में हैं।
Election Commission SIR Supreme Court Dispute: मतदाता सूची पुनरीक्षण (एसआईआर) पर राजनीतिक टकराव के चलते सुप्रीम कोर्ट में भी इस प्रक्रिया की वैधानिक जांच जारी है। चुनाव आयोग की कार्यशैली और एसआईआर की कथित खामियों व अनियमितताओं के विरोध में विपक्ष के इंडिया गठबंधन द्वारा दाखिल याचिका पर आयोग ने शपथ पत्र के जरिए अपना पक्ष रखा।
इसमें अपने अब तक के कामकाज पर आयोग अडिग नजर आया। इससे कुछ प्रश्नों के उत्तर सामने आए, परंतु कितने ही मुद्दे अनुत्तरित रह गए। एसआईआर के दौरान लगभग 13 करोड़ लोगों के नाम मतदाता सूची से हटाया जाना राजनीतिक दृष्टि से संवेदनशील बन गया है।
मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के निर्णयों पर चुनाव आयुक्त डॉ। सुखबीर सिंह संधू और डॉ। विवेक जोशी ने 14 बार आपत्ति जताई थी। इससे खलबली मच गई थी, लेकिन फिर चुनाव आयोग ने दावा किया कि एसआईआर के बारे में उसके सारे फैसले सर्वसम्मति से हुए थे तथा कोई भी सुझाव या शंका को निर्णय से नहीं जोड़ा जा सकता।
साथ में नए मतदाताओं के लिए जोड़ा गया फॉर्म 6 अतिरिक्त घोषणा पत्र अलग दस्तावेज है। इससे आवेदन में बदलाव नहीं हो सकता। अधिकारों के दायरे से बाहर जाकर आदेश जारी करने वाले अधिकारियों पर कार्रवाई होगी। फॉर्म 6 में कहा गया था कि वोटर अपने माता-पिता के 2002 में मतदाता होने का विवरण दें। दोनों चुनाव आयुक्तों की आपत्ति थी कि ऑनलाइन आवेदन क्रमांक 6 में अतिरिक्त घोषणा पत्र जोड़ने का निर्णय कंप्यूटर प्रणाली के प्रोग्रामर या आयोग में किस स्तर पर लिया गया, यह स्पष्ट नहीं हुआ।
अनेक बातों पर निर्णय हो जाने के बाद हमें जानकारी दी गई। इस मुद्दे को लेकर न्यायालय संबंधित दस्तावेज मंगा सकता है। यदि माना जाए कि आवेदन में बदलाव एकमत से हुआ तो याचिकाकर्ता की यह आपत्ति मौजूद रहती है कि ऐसा बदलाव करने का अधिकार विधि मंत्रालय का है तथा संसद में मंजूर नियमावली में फेरबदल करना गैरकानूनी व अनाधिकार चेष्टा है। संबंधित घोषणा पत्र स्वतंत्र दस्तावेज होने का दावा चुनाव आयोग करता है, तो उस पर 'टिक' किए बिना लाखों मतदाताओं के आवेदन सबमिट नहीं हुए होते।
इसलिए वह स्वतंत्र है या अविभाज्य? आवेदन क्र. 6 के साथ संबंधित घोषणा पत्र आयोग के पोर्टल पर दिखने से संभ्रम निर्माण हुआ, इस आशय का आयोग का दावा अनाकलनीय है। बाद में घोषणा पत्र स्वतंत्र बताना दिखाता है कि आयोग अपनी भूमिका से पीछे हट गया। गत 28 जुलाई को एक अधिकारी द्वारा जारी आंतरिक कार्य विभाजन का आदेश भी विवाद का मुद्दा है। इस आदेश में मुख्य चुनाव आयुक्त को एकतरफा निर्णय लेने का विशेष अधिकार दिया गया था। अन्य दोनों आयुक्तों के आपत्ति उठाने पर वह आदेश लागू नहीं हो पाया।
लेख- चंद्रमोहन द्विवेदी के द्वारा