(डिजाइन फोटो)
महाराष्ट्र की महायुति सरकार में इन दिनों कुछ अजीब सा माहौल है। चुनाव आयोग द्वारा हरियाणा और जम्मू-कश्मीर के साथ चुनाव नहीं कराए जाने के फैसले के बाद सत्तारूढ़ गठबंधन महायुति ने राहत की सांस ली है। इस अवसर का लाभ उठाते हुए अब बीजेपी, शिंदे की शिवसेना और अजीत पवार की राकां इन तीनों दलों ने लोकसभा चुनाव के परिणामों से मिले ‘जख्मों’ को भरने की कवायद शुरु कर दी है।
बीजेपी को छोड़कर बाकी दोनों दल राज्य के कुछ क्षेत्रों तक ही सीमित है। मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे की पार्टी सबसे ज्यादा ठाणे उसके बाद मुंबई और राज्य के एकाध दूसरे हिस्से में अपनी ताकत रखती है। वहीं अजीत पवार की राकां तो पश्चिम महाराष्ट्र और मराठवाड़ा में ही अपना दम-खम रखती है। मध्य प्रदेश की तर्ज पर बनी लाडली बहन योजना पर इन तीनों दलों को बहुत भरोसा है और अब तीनों दल अपने-अपने स्तर पर इस योजना के भरोसे विधानसभा की वैतरणी पार करने में लगे हुए हैं।
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इसी क्रम में अजीत पवार अपने नए प्रोपेगेंडा मैनेजर के साथ पश्चिम महाराष्ट्र के इलाकों में यात्रा पर निकले हुए हैं। उनका अपना इलाका है, इसलिए वो वहां ‘एकला चलो की भूमिका’ में आगे बढ़ रहे हैं। 1-2 दिन पहले जब यात्रा जुन्नर तहसील के नारायणगढ़ पहुंची तो वहां अजीत ने एक सरकारी बैठक बुला ली। जब बैठक सरकारी होगी तो उसमें न्योता महायुति के सभी दलों को मिलना चाहिए। निमंत्रण नहीं मिलने से बौखलाए बीजेपी के कार्यकर्ताओं ने अजीत को काले झंडे दिखाए और रोष प्रकट करते हुए नए विवाद को जन्म दे दिया। वैसे भी लोकसभा में बीजेपी की जो फजीहत हुई है, उससे पार्टी और आरएसएस के लोगों को लगता है कि अजीत पवार भी प्रमुख कारण है।
अब चुनाव सिर पर है और अजीत को काले झंडे दिखाए जाने से दोनों दलों में कटुता और बढ़ेगी। इसको कम करने की महती जिम्मेदारी महायुति के तीनों दलों के शीर्ष नेताओं पर रहेगी। राज्य की सत्ता के कारण उनके दिल तो मिले हुए हैं। तीनों पार्टियों का आम कार्यकर्ता इन दिनों ठगा हुआ महसूस कर रहा है। उसमें भी काले झंडे जैसे कारनामे जख्म पर नमक रगड़ने का काम करते हैं। इसे रोका नहीं गया तो लोकसभा की तर्ज पर ही विधानसभा के परिणाम आएंगे, इसमें कोई शंका नहीं है।
लेख चंद्रमोहन द्विवेदी द्वारा